Monday, August 15, 2011

तुष्टीकरण की शिकार रही है तस्लीमा............

तस्लीमा नसरीन...... एक जाना पहचाना नाम है.... शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इनके नाम से परिचित नहीं होगा......नसरीन का जन्म २५ अगस्त १९६२ को एक मुस्लिम परिवार में हुआ था....प्रसिद्द लेखिका नसरीन ने अपने जीवन की शुरुवात चिकित्सा के पेशे से की......१९८४ में चिकित्सा की पड़ी पूरी करने के बाद उन्होंने ८ वर्ष तक बंगलादेश के अस्पताल में काम किया .... सामाजिक गतिविधियों से जुड़े होने के बाद भी उन्होंने अपने को साहित्यिक गतिविधियों से दूर नहीं किया...... मात्र १५ वर्ष की आयु में कविता लिखकर अपनी लेखनकला की ओर सभी का ध्यान खींचा..... तस्लीमा की पहली पुस्तक १९८६ में प्रकाशित हुई.....१९८९ में वह अपनी दूसरी पुस्तक को प्रकाशित करवा पाने में सफल रही.... इसके बाद तस्लीमा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा .......

इस दूसरी पुस्तक को लिखने के बाद उनको दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों के संपादको की ओर से नियमित कॉलम लिखने के आमंत्रण आने लगे.... इस अवधि में "सैंट ज्योति" पाक्षिक पत्रिका का संपादन भी उनके द्वारा किया गया...तस्लीमा हमेशा बंगाली भाषा में लिखती रही है..... नसरीन को धर्म, संस्कृति, परम्पराव की आलोचना करने में कोई भय नहीं रखता ..... इसी कारन उनकी ६ मुख्य पुस्तके प्रतिबंधित श्रेणी में आती है जो क्रमश "लज्जा" (१९९३), अमर मेबले( १९९९), उताल हवा(२००२), को(२००३), द्विखंडितो( २००३), सी सब अंधकार (२००४) शामिल है......

तस्लीमा की पुस्तकों पर उनके गृह देश बंगलादेश में भी विरोध के स्वर मुखरित होते रहे है.... जहाँ शेख हसीना ने इन पुस्तकों को अश्लील करार दिया है वही भारत की पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने
मुस्लिम कौम की भर्त्सना करने के चलते इन पुस्तकों पर प्रतिबन्ध लगाया..... १९९२ में तस्लीमा बंगलादेश का प्रतिष्टित साहित्यिक अवार्ड "आनंदा " पाने में सफल रही.... निडर होकर धर्म के विरोध में लिखने के कारन "सोल्जर ऑफ़ इस्लामी ओर्गनाइजेशन " ने इनके खिलाफ मौत का फ़तवा जारी कर दिया.... जिसके बाद से कभी उन्होंने जनता के सामने आना पसंद नहीं किया........वह की सरकार ने उनके खिलाफ उग्र प्रदर्शनों से बचाव हेतु उनका पास पोर्ट जब्त कर लिया ओर देश से निर्वासित होने का फरमान जारी करदिया .......

२००४ में उनके खिलाफ विरोध जताने के एक मुद्दे के तौर पर यह कहा गया अगर किसी ने उनके मुह कला कर दिया तो उसको अवार्ड दिया जायेगा......बंगलादेश के धार्मिक नेता सैयद नूर रहमान तो तस्लीमा के लेखन से इतना आहत हुए उन्होंने इनको आतंकवादी संगठन जीबी का जासूस तक करार दे डाला......२००५ में अमेरिका पर लिखी गई एक कविता पर फिर से उन्हें मुस्लिम समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणिया करने के कारन खासी फजीहतें झेलनी पड़ी.......

मार्च २००५ में उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम संगठनो ने इनका सर कलम करने के लिये ६ लाख के इनाम की घोषणा की.....इसके बाद ९ अगस्त २००७ को हैदराबाद प्रेस क्लब में उनके तेलगु संस्करण शोध के विमोचन के मौके पर "मुतेह्दा मजलिस ऐ अमल" के १०० लोगो ने ३ विधान सबहहा सदस्यों के साथ इन पर हमला बोल दिया.......इस घटना पर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा हम इस्लाम के खिलाफ लिखने ओर बोलने वाले का विरोध करते रहेंगे.... सितम्बर २००७ में तस्लीमा पर कुछ कट्टरपंथियों ने हमला बोल दिया ... भारत में इसी दौरान "अल इंडिया मईनोरिटी" फोरम ने इनके भारत रहने पर सवाल उठायेओर इन्हें भारत से निकलने की मांग की.... स्थिति को बिगड़ता हुआ देख पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सर्कार ने इनकी हिफाजत के लिये पुलिस नियुक्त की......परन्तु स्थिति नहीं संभल पायी......

२१ नवम्बर २००७ को इन्हें जयपुर ले जाया गया और रातो रात दिल्ली लाया गया.....३० नवम्बर २००७ को कट्टरपंथियों के विरोध को शांत करने के लिये तस्लीमा अपनी विवादित पुस्तक "द्विखंडितो" से ३ पन्ने हटाने को तैयार हो गई....इसके बाद तस्लीमा को उम्मीद थी तमाम विवाद उनका पीछा छोड़ देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.... ९ जनवरी २००७ को फ्रांस सरकार ने उन्हें" सियोमन दी वियोवर" सम्मान महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिये दिया....कुछ साल पहले तक भारत सरकार ने उन्हें जयपुर में एक गुप्त स्थान में रखा जहाँ पर उन्हें किसी से मिलने की अनुमति नहीं दी गई......

भले ही नसरीन को भारत छोड़ते हुए लम्बा समय हो गया हो लेकिन आज भी वह कोलकाता को अपना घर मानती है.....तसलीमा तो भारत से चली गई लेकिन उनके जाने के बाद भारत की धर्म निरपेक्ष छवि को करार तमाचा लगा अहि.....हमारे साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है हम इतिहास की घटनाओ से सबक नहीं सीखते .... "सैटेनिक वर्सेज" जिस दौर में रुश्दी ने लिखा तो पूरे इस्लाम जगत में हलचल मच गई ऐसे समय में ब्रिटेन ने रुश्दी को व्यापक सुरक्षा मुहैया करवाईलेकिन एक हम है जो अतिथि देवो भवः का दंभ भरते है ओर किसी शरानाठी को ठीक से सुरक्षा भी नहीं दे सकते.....

Sunday, August 14, 2011

भारतीय राजनीती में गहरा रहा है परिवारवाद........

हमारे देश की राजनीती में परिवारवाद तेजी से गहराता जा रहा है.....जिस तेजी से परिवारवाद यहाँ पैर पसार रहा है उसके हिसाब से वह दिन दूर नहीं जब देश में कोई भी ऐसा नेता मिलना मुश्किल हो जायेगा जिसका कोई करीबी रिश्तेदार राजनीती में नहीं हो .....
राजनीतिक परिवारों के लिये भारतीय राजनीती से ज्यादा उर्वरक जमीन पूरे विश्व में कही नहीं है.....आज का समय अब ऐसा हो गया है राजनीती का कारोबार सभी को पसंद आने लगा है ॥ तभी सभी अपने नाते रिश्तेदारों को राजनीती में लाने लगे है....ऐसे हालातो में वो लोग" साइड लाइन" होने लगे है जिन्होंने किसी दौर में पार्टी के लिये पूरे मनोयोग से काम किया था...
आज के समय में नेताओ का पुत्र होने लाभ का सौदा है .... अगर आप किसी नेता के पुत्र है तो सारा प्रशासनिक अमला आपके साथ रहेगा ........यहाँ तक की मीडिया भी आपकी ही चरण वंदना करेगा ....अगर खुशकिस्मती से आप अपने रिश्तेदारों की वजह से टिकट पा गए तो समझ लीजिये आपको कुछ करने की जरुरत है ..... चूँकि आपके रिश्तेदार किसी पार्टी से जुड़े है इसलिए उनके साथ कार्यकर्ताओ की जो फ़ौज खड़ी है वो खुद आपके साथ चली आएगी......
इन सब बातो के मद्देनजर वो कार्यकर्ता अपने को ठगा महसूस करता है जिसने अपना पूरा जीवन पार्टी की सेवा में लगा दिया... धीरे धीरे भारतीय राजनीती अब इसी दिशा में आगे बढ़ रही है .....
राजनीती में गहराते जा रहे इस वंशवाद को अगर नहीं रोका गया तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे लोकतंत्र का जनाजा ये परिवारवाद निकाल देगा .......भारतीय राजनीती आज जिस मुकाम पर कड़ी है अगर उस पर नजर डाले तो हम पाएंगे आज राष्ट्रीय दल से लेकर प्रादेशिक दल भी इसे अपने आगोश में ले चुके है..... कांग्रेस पर राजनीतिक परिवारवादी बीजो को रोपने का आरोप शुरू से लगता रहा है लेकिन आज आलम यह है कल तक परिवारवाद को कोसने वाले नेता भी आज अपने बच्चो को परिवारवाद के गर्त में धकेलते जा रहे है..... देश की मुख्या विपक्षी पार्टी भाजपा में भी आज यही हाल है ... उसके अधिकांश नेता आज परिवारवाद की वकालत कर रहे है....."हमाम में सभी नंगे है" कमोवेश यही हालात देश के अन्य राजनीतिक दलों में भी है........
भारतीय राजनीती में इस वंशवाद को बढाने में हमारा भी एक बढ़ा योगदान है.....संसदीय लोकतंत्र में सत्ता की चाबी वैसे तो जनता के हाथ रहती है लेकिन हमारी सोच भी परिवारवाद के इर्द गिर्द ही घुमा करती है .... वह सम्बन्धित व्यक्ति के नाते रिश्तेदार को देखकर वोट दिया करती है....जबकि सच्चाई ये है , चुनाव में राजनीतिक परिवारवाद से कदम बढ़ने वाले अधिकाश लोगो के पास देश दुनिया ओर आम आदमी की समस्याओ से कोई वास्ता ओर सरोकार नहीं होता ......वो तो शुक्र है ये लोग अपने पारिवारिक बैक ग्राउंड के चलते राजनीती में अपनी साख जमा लेते है ......

ऐसे लोगो ने भारतीय राजनीती को व्यवसाय बना लिया है .......जहाँ पर उनकी नजरे केवल मुनाफे पर आ टिकी है.....इसी के चलते आज वे किसी भी आम आदमी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते......वन्स्वाद अगर इसी तरह से अगर आगे बढ़ता रहा तो आम आदमी का राजनीती में प्रवेश करने का सपना सपना बनकर रह जायेगा ........परिवारवाद को बढाने वाले कुछ लोगो ने राजनीती को अपनी बपोती बना कर रख दिया है......यही लोग है जिनके कारन आज "जन लोकपाल " बिल पारित नहीं हो पा रहा है.... अन्ना सरीखे लोगो ने आज इन्ही की बादशाहत को खुली चुनोती दे दी है ......जिसके चलते खुद को सत्ता का मठाधीश समझने वाले इन नेताओ का सिंहासन आज खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है.........

Thursday, September 9, 2010

हवाई अड्डे के लिये नवी मुंबई का नया नक्शा तैयार

महाराष्ट्र सरकार नवी मुंबई इलाको का एक नया नक्शा केंद्र सरकार को सौपेंगी जिससे वहां हवाई अड्डे के अनुमोदन की प्रक्रिया में तेजी आएगी नवी मुंबई का नक्शा इससे पहले १९९५ में तैयार किया गया था जिसे हवाई अड्डे की योजना में शामिल किया गया थालेकिन केंद्र सरकार की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने वहां लम्बे समय से कड़ा ऐतराज जताया था शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारी ने आज कहा की नया नक्शा अन्ना विश्व विद्यालय द्वारा तैयार किया गया है जो केंद्र सरकार के तटीय मानचित्र सेल द्वारा अधिकृत हैउन्होंने कहा नक़्शे को एमसी जेड एम ऐ मुंबई की एक बैठक में मंजूरी दी गई नए नक़्शे में सी आर जेड इलाके के साथ ही मैन्ग्रोव को बदा दिया गया है क्युकि एक इलाके में नदियों की बाद से ज्वारीय और पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण पानी का स्तरकाफी ऊपर चला गया है पुराने नक़्शे को १/२५००० के पैमाने पर पूरा किया गया है वही नए नक़्शे का पैमाना १/४००० है जिसमे सभी सीमाओ का सीमांकन किया गया है केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राज्य सरकार को लिखा है कि विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति द्वारा २२ सितम्बर के बाद हवाई अड्डे की साईट का दौर किया जाएगा

Tuesday, September 7, 2010

खबर हो खली तो टी आर पी महाबली.......

खबरिया चैनलों की भीड़ में हिन्दी चैनलों से जनसरोकारो वाली खबरे मीडिया से दूर होती जा रही है... खासतौर से भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया में जिस तरीके से आजकल खबरों को परोसा जा रहा है वह काफी चिंताजनक है ... अगर एन डी टी वी को छोड़ दिया जाए तो अन्य चैनल खबरों के मामले में मनोरंजन परोस रहे है.... आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता ने एक नयी अलख जगाई थी... उस दौर में पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी लेकिन समय बदलने के साथ आज की पत्रकारिता बाजार के दबाव में व्यवसायिक हो गई..... ९० के दशक में भारत में खबरिया चैनलों का आगाज हुआ....देखते देखते चैनलों की संख्या बदती गई... एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ के चलते चैनलों से जनसरोकारो वाली खबरे गायब होती जा रही है.... चैनल खबरों के नाम पर मनोरंजन , सनसनी को परोस रहे है....
आज के हिन्दी के खबरिया चैनल खबरों के नाम पर थ्री सी सिनेमा , क्रिकेट ओर सेलेब्रिटी को परोस रहे है.... यही नहीं खबरिया चैनल व्यक्ति की निजी जिन्दगी पर भी खबरे चटपटे अंदाज में दे रहे है....
एक आरुषीकी मौत हो जाती है तो उसकी मौत पर सारा मीडिया बावला हो जाता है.... जबकि आरुषी जैसी कई लड़कियां कोख में जन्म लेने से पहले मार दी जाती है लेकिन हिंदी के खबरिया चैनलों को इससे कोई सरोकार नहीं है.....खबरों को मिर्च मसाले का तड़का देने के चक्कर में भूत प्रेत कंकाल वाली टी वी की हिंदी पत्रकारिता में इजाफा होता जा रहा है .... एक बच्चा अगर कही गिर जाए तो मीडिया उस पर खबरे बनाने में पीछे नहीं रहता लेकिन असलियत ये है सारे मामले मेट्रो के रहते है इसलिए मीडिया इनको तवज्जो देता है जबकि ग्रामीण इलाको में ऐसी घटनाये आये दिन घटती रहती है जिन पर हमारे खबरिया चैनलों की नजर नहीं जा पाती है... आज के खबरिया चैनलों से गाव का किसान गायब हो गया है ... पिछले तीन सालो में लाखो किसानो ने आत्महत्या की लेकिन उनकी खबरे मीडिया से नहीं आ सकी .....आमिर खान की "पीपली लाइव" में एक नत्था फिल्म चलने के बाद सारे मीडिया के सर चढ़ जाता है लेकिन नत्था जैसे कई किसानो पर मीडिया का कोई फोकस नहीं होता है...
इन दिनों हिंदी के मीडिया चैनलों में एक नया चलन चल गया है... कोई रफ़्तार से ५ मिनट में २५ खबरे दिखा रहा है तो कोई फटाफट में ४० खबरे दे रहा है ... हिंदी न्यूज़ चैनलों की माने तो ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि दर्शक खबरों से जुड़े रहे ... वैसे भी आज के समय में खबरिया चैनलों के दर्शक के पास इतना समय नहीं है वह देश दुनिया की खबरे देख सके लिहाजा उनका ये नया कांसेप्ट भी दर्शको को रास नहीं आ रहा है ... खबरे इतनी तेजी से फ्लैश हो जाती है ५ मिनट के बाद दर्शक को ये ध्यान भी नहीं रहता उसने कितनी खबरे देख ली है...
खबरिया हिंदी चैनलों में आजकल किसी मसले पर व्यापक पड़ताल भी नहीं हो रही ...हर किसी से आगे निकलने की होड़ इतनी तेज है आज खबरों की वास्तविकता से रिपोर्टरों का कुछ भी लेना देना नहीं है..... चैनलों में बड़े पदों पर बैठे लोगो को टी आर पी से मतलब होता है ...जिस चैनल की टी आर पी जितना ज्यादा होगी उस चैनल को उतने ज्यादा विज्ञापन मिलेगे.... माना आज के समय में व्यावसायिकता का बोलबाला है लेकिन हिंदी चैनल जनसरोकारो वाली खबरों को अलग नहीं रख सकते.... हिंदी चैनलों को राखी सावंत की चुम्मा बेचने ओर हंसी के रसगुल्ले बेचने से ही फुर्सत नहीं है ...
मीडिया के बहुत से विश्लेषको का मानना है भारतीय खबरिया चैनल अभी शैशव काल में है इसी के चलते आम आदमी के सरोकार टी वी के हिंदी चैनलों से दूर होते जा रहे है.... बेंजामिन ब्रेडली पत्रकारिता जगत का एक बहुत बड़ा नाम है.... शेखर गुप्ता एक बार जब अपने चैनल में उनका साक्षात्कार कर रहे थे तो उन्होंने एक बात बहुत अच्छी कही ... उन्होंने कहा था अमेरिका में आज के समय में अखबार पड़ने वाले दर्शको की संख्या में तेजी से कमी आते जा रही है ....लेकिन उन्होंने कहा अब वहां की टीवी पत्रकारिता बुनियादी मुद्दों की ओर लौट रही है ... अगर इसको आधार बनाये तो हम भारत में खबरिया चैनलों से भी इस बात की उम्मीद कर सकते है कुछ समय बाद भारत के हिंदी के खबरिया चैनलों में भी ये चलन देखने को मिल सकता है ...आखिर जब अपने घर में खाने को नहीं होगा तो कब तक राखी सावंत की चुम्मा , राजू श्रीवास्तव के हंसी के फब्बारे बेचते रहेंगे......
पंक्तिया सटीक है -----
"एक समय आयेगा जब पत्थर भी गाना गायेगा
मेरे बाग़ का फूल फिर से खिल खिलायेगा "

--------------- हर्षवर्धन पाण्डे

Monday, September 6, 2010

भाजपा विधायक दीनू सोलंकी के चचेरे भाई शिव सोलंकी को गुरुवार को राजकोट एयर पोर्ट में आर टी आई एक्टिविस्ट अमित जेठवा की हत्या के सिलसिले में गुजरात पोलिसे ने गिरफ्तार किया.... क्राईम ब्रांच के चीफ मोहन झा ने बताया की शिव सोलंकी को पोलिसे ने उस समय गिरफ्तार किया जिस समय वे मुंबई के लिए रवाना होने वाले थे ....जित्व के कुछ दिन पहले हाई कोर्ट में गिर वन इलाके में अवैध खनन के खिलाफ एक जन हित याचिका दायर की थी जिसके बाद मोटर साइकिल में सवार दो लोगो ने उनकी हत्या कर दी थी....उनके पिता भीखाभाई जेठवा ने बेटे की हत्या के पीछे जूनागढ़ से भाजपा विधायक की हाथ होने की आशंका जताई है......



पहली बार जम्मू सुरक्षाकर्मियों एक
एकe जम्मू में एकe जायदा नागरिको को मारा.......



केंद्र सरकार जम्मू में जारी हिंसा को कम करने के लिए





Sunday, October 11, 2009

अरुणाचल का दंगल...........

प्रचार थम चुका है ..... आज पड़ रहे वोट राज्य की भावी सरकार की रूप रेखा को तय करने में मदद करेंगे.... हम बात कर रहे है १३ तारीख को होने जा रहे ३ राज्यों के विधान सभा चुनाव की जिसमे पूर्वोत्तर के राज्य अरुणाचल प्रदेश में भी मतदान होना है.....अरुणाचल का चुनावी पारा इस बार ख़राब मौसम में भी सातवे आसमान में रहा ... कांग्रेस के साथ सभी पार्टी चुनाव प्रचार में आगे रही.... ६० सीटो के लिए होने जा रहे अरुणाचल के चुनाव में इस बार बहुत से उम्मीदवार अपना भाग्य आजमा रहे है.. अरुणाचल एक छोटा राज्य है जिसकी देश की राजनीती में उतनी धमक नही है जितनी उत्तर प्रदेश, कर्णाटक,पश्चिम बंगाल, महारास्ट्र, तमिल नाडू जैसे राज्यों की हुआ करती है .... वैसे भी यहाँ पर लोक सभा की २ सीट और राज्य सभा की १ सीट हुआ करती है ... लेकिन इन सबके बावजूद इस बार पूर्वोत्तर के इस राज्य पर सभी की नजरे लगी है ..... पिछले कुछ समय से पड़ोसी चीन की घुसपैठ की खबरों ने हमारे देश में हलचल खड़ी कर दी थी..... चीन से अरुणाचल की भी सीमा लगी हुई है लिहाजा अरुणाचल का भी फोकस में आना लाजमी है .... अरुणाचल को चीन अपना बताता रहा है अब यह अलग बात है वहाँ की जनता उसकी इन हरकतों से आजिज हो गई है॥

अरुणाचल लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत गद रहा है ...इस बार भी अधिकांश विश्लेषक यहाँ कांग्रेस सरकार को वोक ओवर दे रहे है संभवतया इसका कारन यहाँ का इतिहास रहा है ... आपको यह बताते चले की अरुणाचल में उसी की सरकार बनती है जिसकी केन्द्र में सरकार हो.... इस जुमले पर अगर यकीन करे तो राज्य में कांग्रेस की सरकार बन्ने से कोई नही रोक सकता ...परन्तु इस बार खांडू की राह आसान नही है ... उनकी पार्टी के कई लोगो ने शुरुवात से ही अपने बगावती तेवर अपना लिए है जिसके चलते कई जगह पार्टी की हार की सम्भावना बन रही है ...ममता बनर्जी ने के साथ अपना गठबंधन कर लिया है... और तो और लगभग १५ के आसपास पूर्व मंत्रियो और विधायको को उन्होंने राज्य में tikat दे दिए है जो कांग्रेस की जीत की संभावनाओ पर पलीता लगा रहे है ..खांडू के विरोध में कई लोग sakriy हो गए है ... परिवारवाद की आधी जिस तरीके से कांग्रेस में फल फूल रही है उसको देखते हुए कई लोग कांग्रेस से गुड बाय कह चुके है ... साथ ही राज्य की कांग्रेस में इस समय भयंकर गुटबाजी चल रही है ॥ इन सबके मद्देनजर कांग्रेस अपनी पुरानी सीट बरकरार रख लेगी यह कह पाना मुश्किल दिखाई देता है..इधर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी ममता के साथ मिलकर कांग्रेस को हराने की कोशिशों में जुट गई है ...पी ऐ संगमा ने अपनी चुनावी सभाओ में कांग्रेस की जमकर खिचाई की है ... उनकी बेटी अगाथा संगमा ने भी राज्य में धुआधार प्रचार किया है जिसके परिनाम्म कुछ समय बाद सामने आ सकेंगे.....सबसे ख़राब हालत भाजपा की है ॥ पिछली बार ९ सीट उसने जीती थी ..उसके बाद उसके सारे प्रत्याशी कांग्रेस के पाले में आ गए ....अब खतरे की घंटी उसके लिए उस समय बज गई जब किरण रिजीजू जो पूर्व सांसद है भाजपा से नाता तौड़ लिया .....पिछली बार थोडी बहुत सीट भाजपा को दिलाने में रिजीजू का बड़ा योगदान था.... उनको भावी सी ऍम के रूप में भी देखा जाने लगा था.. अब उनकी भाजपा से विदाई के बाद भाजपा अपनी पुरानी सीट अगर बचा लेगी तो बड़ी गनीमत होगी...... रही बात मुद्दों की तो बुनियादी मुद्दे इस चुनाव में भी साथ है..अभी भी अरुणाचल बुनियादी समस्याओ से वंचित रहा है..इधर मनमोहन ने भी लोगो को आश्वस्त किया है अरुणाचल के पिछडेपन को दूर करने के लिए सरकार एक बड़ा पैकेज देगी ...देखना होगा क्या मनमोहन लोगो का भरोसा जीत पाने में कामयाब हो पाते है या नही ... जो भी हो ममता और राकपा के गठबंधन होने से खाडू के पसीने छूट गए है ?

आईये अब बात महाराष्ट्र की कर लेते है यहाँ भी आज मतदान होना है ॥ एक तरफ़ कांग्रेस राकपा का गठबंधन है तो दूसरी तरफ़ भाजपा शिवसेना का पुराना गठबंधन ... राम दास अठावले के नेतृत्व में बना तीसरा मोर्चा भी अपनी धमाकेदार उपस्थिति इस चुनाव में दर्ज करा रहइस मोर्चे में २३ पार्टिया है ॥ तीसरे मोर्चे के लिए खतरे की घंटी बज गई है क्युकी उससे गवई गुट अलग हो चुका है ... अब देखना होगा देश में तीसरे और चौथे मोर्चे को नकार चुकी जनता क्या इस बार महारास्त्र में उसको कमान सोपती है॥
कांगरी की बात करे तो पर उसको सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है... हालत बहुत अच्छे नही है....अगर लोक सभा के परिणामो पर नजर डाले तो यहाँ दोनों गठबन्धनों में १० सीट का अन्तर रहा था .... कांग्रेस राकपा भाजपा शिवसेना से मात्र १० सीट आगे रही थी॥ अगर इस पर यकीन करे तो यहाँ पर कांग्रेस का पलडा बहुत भारी नही कह सकते.... हाँ यह अलग बात है ९५ में एक बार भाजपा शिवसेना की सरकार यहं जरुर बनी थी पर अभी तक यहाँ कांग्रेस का राज रहा है.... महंगाई , बिजली ,पानी , किसान आत्महत्या ,जैसे मुद्दे कांग्रेस के लिए संकट पैदा कर सकते है ..परिसीमन ने पूरा गणित गडबडा दिया है ...चुनाव में तकरीबन ८९ सीट परिसीमन से प्रभावित हुई है ...राकपा का गद मानी जाने वाली पश्चिमी महाराष्ट्र की करीब ७० सीट परिसीमन से प्रभावित हो गई है अब अगर इस चुनाव में कोई नए नतीजे सामने आ जाए तो कोई चौकने की बात नही होनी चाहिए॥ अल्पसंख्यक वोट भी खासे अहम् है ॥ इस बार यह किसकी और जाते है यह भी महत्वपूर्ण होगा ...खेल ख़राब करने में यह खासे अहम् होंगे॥ अठावले कांग्रेस के कुछ वोट काट सकते है ..अगर दलित और मुस्लिम वोटो में सेंध लगा पाने में वह कामयाब हो गए तो राकपा और कांग्रेस की मुश्किलें तेज हो जायेंगी... चुनावो में कुछ इलाके ऐसे है जो हार जीत को तय करेंगे....पश्चिम महारास्त्र शरद पवार का गद रहा है .... यह इलाका गन्ना उत्पादक किसानो का है॥ इस समय किसान शरद पवार से नाराज चल रहे है जिसका खामियाजा उनको हार के रूप में भुगतना पड़ सकता है ...उत्तरी महारास्त्र में राज ठाकरे मजबूत है... इस बार भी वह यहाँ के समीकरणों को प्रभावित करने की कैपेसिटी रखते है ॥ मराठवाडा में शिव सेना भाजपा गठबंधन मजबूत नजर आ रहा है ॥ यह अलग बात है यह अशोक चौहान का भी नगर है...कोंकण नारायण राने का गद रहा है... इस बार भी यह पर उनका जलवा चल सकता है ..विदर्भ के इलाके में कांग्रेस राकपा को परेशानी उठानी पड़ सकती है ... क्युकी किसानो ने सबसे अधिक आत्महत्या यही की है ...देश में आत्महत्या के मामलो में विदर्भ सबसे आगे है..यहापर शिवसेना भाजपा अच्छा कर सकते है ...

मुंबई की ३६ सीटो पर भी सबकी नजर है ..यहं की ३० सीट उत्तर भारतीय के प्रभाव वाली है ...यहं पर मराठा मानुष का मुद्दा फीका पड़ सकता है...कभी इन सीटो पर शिव सेना का प्रभाव हुआ करता था पर आज परिस्थिति बदल चुकी है ...थाने की २४ सीट भी भावी सरकार की दिशा को तय करेंगी... इन सीट पर भी शिव सेना भाजपा आगे रहा करती थी लेकिन इस लोक सभा चुनाव में वह बुरी तरह से पीछे हो गई थी.....राज ठाकरे की बात करे तो लोक सभा चुनाव में शिव सेना को हारने में उन्होंने खासी भूमिका निभायी ......तकरीबन १० सीट पर वह लोक सभा चुनाव में आगे रही जिसने शिव सेना की सीट कम कराने में अहम भूमिका निभायी...अब इस चुनाव में वह पहली बार मैदान में उतर रही है ...राज की माने तो मराठियों के साथ इस चुनाव में न्याय किया जाएगा....उनके हितों की रखवाली राज ही कर सकते है... इतना तय है राज इस बार भी शिव सेना भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते है ॥ लोक सभा चुनावो में भी देखा गया था उनकी पार्टी तीसरे नम्बर पर रही थी साथ ही दुसरे खेल ख़राब करने में उसने अहम भूमिका निभाई थी इस लिहाज से देखे तो इस बार भी ज़ंग रोमांचक हो रही है.... तीसरा मोर्च अगर अच्छी स्थिति में चले गया तो कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है ... खैर ,जो भी हो महाराष्ट्र की इस बार की ज़ंग रोमांचक बनती जा रही है ...तीसरा मोर्चा और राज की मनसे दोनों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है ॥ ऐसे में देखना होगा महाराष्ट्र के महाभारत में कौन सा योद्धा विजयी होता है ?

Wednesday, February 4, 2009

ऑस्कर की ओर बदते "स्लम डॉग" के कदम .... ........

रहमान के "गोल्डन ग्लोब" जीतने के बाद विश्व भर में "स्लमडॉग मिलेनियर" खासी सुर्खियों में आ गई है..... एक साथ ४ गोल्डन ग्लोब जीतना किसी भी फ़िल्म निर्माता के लिए एक बड़ी उपलब्धि है...इसको सही से साकार किया है " डैनी बोयल " ने... डैनी एक विदेशी फ़िल्म निर्देशक है.... उनकी स्लम डॉग अब भारत में भी रिलीज़ हो गई है... रहमान के गोल्डन ग्लोब जीतने के बाद से ही हमारे देश में जश्न का माहौल बन गया था ...यही कारण था वह भारत में फ़िल्म के रिलीज़ होने की प्रतीक्षा करते रहे... यह उत्साह उस समय दुगना हो गया जब स्लम डॉग को ऑस्कर के लिए १० नामांकन मिल गए...मीडिया रहमान का गुणगान करने में लग गया .... डैनी का भी देश विदेशों में जोर शोर से नाम गूजा.... अभी डैनी की सफलता में एक अध्याय उस समय जुड़ गया जब अमेरिका में एक और अवार्ड बीते दिनों उनकी झोली में चले गया...


जहाँ तक फ़िल्म की कहानी की बात है तो इस फ़िल्म का कथानक "विकास स्वरूप " के भारतीय उपन्यास "क्यू एंड ए" पर आधारित है विकास ने २००३ में यह उपन्यास लिखा था जिसका ३५ भाषाओ में अनुवाद हो चुका है इस उपन्यास ने विकास को बहुत चर्चित बना दिया है विकास भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी है जिनकी इस कृति को अफ्रीका में " बोआयाकी " सम्मान से भी नवाजा जा चुका है... अब स्लम डॉग की धूम के बाद उनके इस उपन्यास की बिक्री मार्केट में तेजी से बढ गई है स्लम डॉग सच्चे भारत की तस्वीर को बयां करती है लेकिन भारत के एक बड़े वर्ग को चमचमाते भारत की यह बुलंद तस्वीर रास नही आ रही है इस कारण से यह फ़िल्म विवादों में घिरती जा रही हैकुछ लोगो का मानना है कि इस फ़िल्म में भारत की गरीबी ओर झोपडियो का जीवन मसालेदार अंदाज में फिल्माया है जिस कारण पश्चिम में इसके चाहने वालो की संख्या बढ रही है

वैसे तो यह फ़िल्म विकास के उपन्यास पर आधारित है लेकिन इसकी कहानी उससे हूबहू मेल नही खाती विकास के उपन्यास का नायक जहाँ " राम थॉमस है वही डैनी का नायक "जमाल" है इसी तरह से राम की प्रेमिका उपन्यास में जहाँ नीता है , फ़िल्म में यह "लतिका " है उपन्यास की कहानी कुछ और ही बयां करती है उसमे दिखाया गया है किस प्रकार से धारावी में पला राम नाम का युवक शो शुरू होने के कुछ हफ्ते पहले ही एक अरब की मोटी रकम जीत जाता है लेकिन यहाँ पर एक नई समस्या शो के आयोजकों के सामने आजाती है जब उनके पास राम को देने के लिए रकम नही होती हैअतः वह राम को जालसाज साबित करने में लग जाते है इस दरमियान एक महिला वकील उसकी मदद करने को आगे आती है यह सब फ़िल्म में नही है जो भी हो इस फ़िल्म को देखने के बाद बुलंद भारत की असली तस्वीर देखीजा सकती है आज भी भारत की एक बड़ी आबादी स्लम में रहती है उनका गुजर बसर किस तरह से होता है यह सब हम इस फ़िल्म में देख सकते है गरीबी को लेकर चाहे कुछ भी कहा जा रहा हो लेकिन यह भारत की एक सच्चाई है हम इसको नकार नही सकते आज भी देश की बड़ी आबादी भूख और बेगारी से जूझ रही है उसे दो जून की रोटी भी सही से नसीब नही होती.... इसको पाने के लिए हाड मांस एक करना पड़ता है

फ़िल्म की कहानी "जमाल " और " सलीम" नमक दो युवको के इर्द गिर्द घूमती है स्लम डॉग दोनों की बचपन से जवानी तक के सफर की असली हकीकत को बयां करती हैफ़िल्म में दिखाया गया है एक अदना सा दिखने वाला युवक "जमाल" किस तरह से २ करोड़ जीत जाता हैदोनों के बचपन की दास्ताँ दर्द भरी है बचपन में दंगो की आग में इनकी माँ का कत्ल हो गया जिसके चलते अलग राह पकड़ने को मजबूर होना पड़ा दंगो के बाद दोनों युवक अंडरवर्ल्ड के शिकंजे में फस जाते है जिसमे उनकी सखी लतिका भी शामिलहो जाती है दोनों इसके चंगुल से छूट जाते है लेकिन लतिका वही की वही फस जाती है देश में बच्चो के अपहरण करने वालो का गिरोह किस कदर सक्रिय है यह फ़िल्म में दिखाया गया है वह बच्चो से अपने मुताबिक काम कराने से कोई गुरेज नही करता वहां से भागने के बाद जमाल की राह तो अलग हो जाती है लेकिन सलीम फिर से गिरोह वालो के चंगुल में फस जाता है जहाँ पर लतिका भी उसके साथ है बाद में जमाल केबीसी के शो में भाग लेता है जहाँ पर सभी सवालों के जवाब देकर वह "मिलेनियर " बन जाता है लेकिन लोग इस बात को नही पचा पाते की कैसे स्लम से आने वाला एक युवक सही जवाब दे देता है ? लेकिन "जमाल" अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर सवालो के जवाब दे देता है अन्तिम सवाल पूछने से पहले पुलिस उसको प्रताडित करने से बाज नही आती लेकिन जमाल का आत्मविश्वास देखते ही बनता है उसकी माने तो "मुझे जवाब आता है" पुलिस उसको पकड़कर इस पहेली का हल खोजने की कोशिस करती है लेकिन उसको सफलता नही मिल पाती "जमाल" के भाग्य में करोड़पति बनना लिखा होता है वह बनकर रहता है
जहाँ फ़िल्म में छोटे जमाल की भूमिका में आयुस उतरे है वही देव पटेल ने बड़े जमाल की भूमिका निभाई है छोटे जमाल के द्वारा किया गया एक शोट ध्यान खीचता है जिसमे जमाल अपने प्रिय अभिनेता " बिग बी " के दर्शनों को पाने के लिए इस कदर बेताब रहता है की वह "गटर" में छलांग लगाकर भीड़ में अपने अंकल के ऑटो ग्राप के लिए हेलीकाप्टर के पास दोड़ता है इरफान खान, अनिल कपूर, फ्रीदा पिंटो का अभिनय भी फ़िल्म में लाजावाब है गुलजार के गाने झूमने को मजबूर कर देते है साथ ही अपने "रहमान " का तो क्या कहना .... जय हो जय हो .... हाथी घोड़ा पालकी जय बोलो रहमान की .....रहमान के संगीत की प्रशंसा में शब्द नही है .... इस बार ऑस्कर पाने की उनसे आशाए है सभी को ... अब २२ फरवरी का इंतजार है .... दिल थामकर बैठिये... सब्र का फल मीठा होता है .....अगर उनको यह मिल जात है तो वह पहले भारतीय होंगे जिसने किसी विदेशी की फ़िल्म में काम कर इसको पाया १० नामांकनों पर सबकी नजरें लगी है भारत में जो लोग स्लम डॉग की आलोचना कर रहे है उनको यह सोचना चाहिए सच्चाई से आप अपने को अलग नही कर सकते ... असली हिंदुस्तान फुटपाथ पर आबाद है सबसे दुःख की बात तो यह है स्लम डॉग भारत का उपन्यास है और इस पर फ़िल्म विदेशी बना रहा है एक सवाल जो हमको बार बार कचोट रहा है वह यह है हमारे " होलीवूड " वाले कब तक "प्यार के फंडो" पर बन रही फिल्मो से इतर सोचना शुरू करेंगे ? इस लीक से हटकर सोचने का माद्दा हमारे यहाँ ले देकर एक व्यक्ति ने निभाया है उसका नाम सत्यजीत ... सत्यजीत ने इस नब्ज को अपनी फिल्मो में सही से पकड़ा लेकिन इसके चलते उनको भी आलोचना का शिकार होना पड़ा था नरगिस के द्वारा पहले भी सत्य जीत राय की फिल्मो की आलोचना की जाती रही है उनका मानना था भारत की गरीबी को सत्य जीत विदेशों में बेच कर आते .... खैर जो भी हो हाल के कुछ वर्षो में भारत का नाम ऊँचा हुआ है॥ अपने "अरविन्द ओडीगा " व्हाइट टायगर " पर पुरस्कार जीतकर भारत का झंडा बुलंद कर चुके ... अब बारी विकास के उपन्यास की है .... क्या हुआ ऑस्कर अगर स्लम डॉग को ही मिले उसकी कहानी तो स्वरूप की ही .......