Friday, August 26, 2011

लील रहा है कुपोषण .....

विदर्भ की कलावती इन दिनों मायूस है.... यह कलावती राहुल गाँधी वाली कलावती नहीं है.......यह कलावती वह है जिसका एक बच्चा अभी एक साल पहले कुपोषण के चलते मर गया..... इस बच्चे की बात करने पर आज भी कलावती सिहर उठती है.... पिछले कुछ वर्षो में जैसी त्रासदी विदर्भ ने देखी होगी शायद भारत के किसी कोने ने देखी होगी......सरकार आये दिन गरीबो को अनाज के नाम पर कई घोषणा कर रही है लेकिन सच्चाई यह है कि गरीबो की झोपड़ी तक कोई अनाज नहीं पहुच पा रहा है जिसके चलते आज कलावती के बच्चे कुपोषण के चलते मारे जा रहे है......


महंगाई को कम करने के सरकार दावे तो जोर शोर से करती रही है लेकिन सच्चाई यह है कि देश में आम आदमी की थाली दिनों दिन महंगी होती जा रही है.....प्रधानमंत्री जहाँ ऊँची विकास दर और कॉरपोरेट नीतियों का हवाला देते नहीं थकते वही देश के वित्त मंत्री यह कहते है हमारे पास महंगाई रोकने के लिये कोई जादू की छड़ी नहीं है तो इस सरकार का असली चेहरा जनता के सामने बेनकाब हो जाता है......हद तो तब हो जाती है जब रिज़र्व बैंक ११ वी बार अपनी ब्याज दर बढाता है ताकि मार्केट में लिक्विडिटी बनी रहे ... इसके बाद भी आलम ये है महंगाई देश को निगलते जाती है और गरीब परिवारों की रोटी का एक बड़ा संकट पैदा हो जाता है ..... आज यह जानकर हैरत होती है कि हमारे देश में भुखमरी की समस्या लगातार बढती जा रही है ......

यूं ऍन ओ की हालिया रिपोर्ट को अगर आधार बनाये तो कुपोषण ने हमारे देश में सारे रिकार्डो को ध्वस्त कर दिया है.....आपको यह जानकर हैरत होगी कि हर रोज तकरीबन ७००० मौते अकेले कुपोषण से हमारे देश में हो रही है.....सरकार खाद्य सुरक्षा कानून लाने की बात लम्बे समय से कर रही है लेकिन इसको पेश करने की राह भी आसान नहीं है......मनमोहन और सोनिया की अगुवाई वाली सलाहकार परिषद् में इसे लेकर अलग अलग सुर है..... राजनेताओ को आम आदमी से कुछ लेना देना नही है ... अगर ऐसा होता तो आज हमारे ऊपर कुपोषण का कलंक नहीं लगता.....

बढती जनसँख्या ने देश में खाद्य संकट को हमारे सामने बड़ा दिया है.....ऐसा नहीं है देश में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान उत्पादन नहीं हो रहा ॥ उत्पादन तो हो रहा है लेकिन फसल के रख रखाव के लिये हमारे पास पर्याप्त मात्रा में गोदाम नहीं है ...... इसी के चलते करोडो का अनाज हर साल गोदामों में सड़ता जा रहा है.... अभी इस बार मध्य प्रदेश में चावल का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है....शिवराज परेशान हो गए है .... सी ऍम होने के नाते उन्होंने केंद्र को चिट्टी लिख दी है... उन्होंने कहा है मध्य प्रदेश में रख रखाव के लिये पर्याप्त गोदाम नहीं है लिहाजा केंद्र सरकार इस अनाज के रख रखाव की व्यवस्था सुनिश्चित करे लेकिन देखिये केंद्र इस पर कोई कार्यवाही नहीं कर रहा .....

कभी कभी सोचता हूँ हमारे देश में केंद्र ओर राज्यों में अलग अलग सरकारे होने के कारन कई बार सही तालमेल नहीं बन सकता .... यही हाल अभी मध्य प्रदेश में हो रहा है....कमोवेश यही हालात आज देश के अन्य राज्यों में है जहाँ पर कांग्रेस सत्ता में नहीं है ......खेती को लाभ का सौदा बनाने की दिशा में आज तक कोई पहल नहीं हुई है जिसके चलते खेती हमारे देश में उजड़ रही है.....

यूनेस्को का कहना है भारत की गिनती दुनिया के सबसे कुपोषित देशो में हो रही है....लेकिन इन सबके बाद मनमोहनी इकोनोमिक्स ऊँची विकास दर और "भारत निर्माण " की अगर दुहाई दे तो यह कुछ हास्यास्पद मालूम पड़ता है .......हद तो तब हो जाती है जब इस देश में घोटालो के बाद एक घोटाले होते रहते है और हमारे प्रधानमंत्री अपनी नेकनीयती का सबूत देते नहीं थकते......

देश की जनसँख्या तेजी से बढ़ रही है ... हाल ही में हमने १२१ करोड़ के आकडे को छुआ है अगर यही सिलसिला जारी रहा तो यकीन जानिए हम चीन को पीछे छोड़ देंगे... ऐसे में बड़ी आबादी के लिये भोजन जुटाने के एक बड़ी चुनौती हमारे सामने आ सकती है....पिछले दो दशको में हमारा खाद्यान उत्पादन १.५ फीसदी तक जा गिरा है.... मनमोहन के दौर में हमारे देश में दो भारत बस रहे है... एक तबका ऐसा है जो संपन्न है ...वही एक तबका ऐसा है जो अपनी रोजी रोटी जुटाने के लिये हाड मांस एक कर रहा है....

याद कीजिये १९९० का दौर उस समय हमारा देश आर्थिक सुधारो की दहलीज पर खड़ा था.... नरसिम्हा राव की सरकार उस समय थी...उस दौर में हमारे देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान की खपत ४६८ ग्राम हुआ करती थी... उदारीकरण के आज २० सालो बाद भी भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान उपलब्धता ४०० ग्राम हो गई है ....यही नहीं आप यह जानकार चौंक जायेंगे १९९० में प्रति व्यक्ति ४२ ग्राम दाल उपलब्ध थी वही २०११ में यह आकडा भी लुढ़क गया और यह २५ ग्राम तक पहुच गया .... यह आंकड़ा औसत है जिसमे मनमोहनी इकोनोमिक्स का संपन्न तबका भी शामिल है साथ ही वह क्लास भी जो रात को दो रोटी भी सही से नहीं खाता होगा...

अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट कहती है देश की ७० फीसदी आबादी आज भी २० रूपया प्रति दिन पर गुजर बसर करती है.....ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है इस दौर में कैसे यह गरीब तबका दो समय का भोजन अपने लिये बनाता होगा ? देश में आज थाली दिन प्रति दिन महंगी होती जा रही है.....घरेलू गैस के दामो में भी सरकार ने इजाफा कर दिया है... यही नहीं तेल के दाम भी बड़ा दिए है इसके चलते लोगो करता जीना दुश्वार होता जा रहा है.....सरकार को तेल कंपनियों का घाटा पूरा करना है ... आम आदमी से कुछ भी लेना देना नहीं है ..... अगर आम आदमी से कुछ लेना देना होता तो उसकी तरफ सरकार ध्यान तो जरुर देती...... शायद तभी आम आदमी का अब यु पी ऐ से मोहभंग होता जा रहा है.....

मनमोहन के दौर में समाज में अमीर और गरीबी की जो खाई चौड़ी हुई है उसके पीछे बहुत हद तक हमारी खाद्यान प्रणाली जिम्मेदार है .....जबसे मनमोहन ने देश में उदारीकरण की शुरुवात की तबसे हर सरकार का ध्यान ऊँची विकास दर बरकरार रखने और सेंसेक्स बढाने पर जा टिका है .....आकड़ो की बाजीगरी आज के दौर में कैसे की जाती है ये हर किसी को मालूम है ....वैसे भी यह बात समझ से परे लगती है आम आदमी करता सेंसेक्स से क्या लेना देना ?

बीते २० सालो में एक खास बात यह देखने में आई है सरकार की विकास दर ओर गरीबी के आकडे दोनों तेजी के साथ बढे है .... सरकारी आंकड़ो में विकास ने "हाईवे " की तरह छलांग लगाई है लेकिन इस रफ़्तार ने कुपोषण , गरीबी, भुखमरी जैसी समस्याओ को बढाया है ....इस दौर में कृषि जैसे सेक्टर की हालत सबसे खस्ता हो गई......शहरों में चकाचौंध तो तेजी से बढ़ी लेकिन गावो से लोगो का पलायन बदस्तूर जारी रहा .....आज आलम यह है की कृषि में हमारी विकास दर दो फीसदी से भी कम है जो हमारे फिसद्दीपने को बखूबी बया किया है......

किसानो को सरकार ने इस दौर में पैकेज भी प्रदान किया है .... इस दौर में बैंक भी किसानो की मदद के लिये आगे आये है लेकिन इन सब चीजो के बाद भी किसान परंपरागत खेती को छोड़ने पर आमादा है......साहूकार के दौर में किसानो पर जो कर्ज के कष्ट थे अब वह लोन के बाद भी ज्यादा बढ़ गए है.....आकडे इस बात की गवाही देने के लिये काफी है किसान आत्महत्या का एक बड़ा कारन कर्ज रहा है...

किसान पर कर्ज को चुकाने का बोझ इतना ज्यादा है की वह समय से इसे नहीं चुका सकता .... वैसे भी भारत की कृषि को "मानसून का जुआ " कहा जाता है जो "इन्द्र देव " की कृपा पर ज्यादा टिकी हुई है......उस पर तुर्रा यह है हमारे प्रधान मंत्री इसे लाभ का सौदा बनाने के बजाय विदेशी निवेश बढाने पर आमादा है जिसकी वकालत शुरू से मनमोहनी अर्थशास्त्र शुरू से करता रहा है...... ऐसे में अपने किसान की खुशहाली दूर की कौड़ी लगती है ......

अपने घर खुशहाली नहीं रहेगी तो दूसरे से मदद मांगने से क्या फायदा.....? लेकिन मनमोहन शायद अमेरिकी अमेरिकी कंपनियों के ज्यादा निकट चले गए है ..... शायद तभी उन्हें अपने देश के पूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री के नारे "जय जवान जय किसान " का एहसास इस दौर में नहीं होता......अगर ऐसा होता तो बीते सात सालो में ढाई लाख किसान आत्महत्याए अपने देश में नहीं होती......और ना ही कुपोषण का यूनेस्को का कलंक हमारे माथे पर लगता..............




Monday, August 15, 2011

ठाकरे की शिवसेना में बेगाने हुए मनोहर ..........

महाराष्ट्र की राजनीती को अगर करीब से समझने का कभी मौका आपको मिला होगा तो कांग्रेस के बाद शिवसेना का गढ़ यहाँ की राजनीती एक दौर में हुआ करती थी....इसे राम लहर में सवार होने की धुन कहे या सियासी बिसात के आसरे "आमची मुम्बई" के नारे देकर वोट लेने का नायाबफ़ॉर्मूला ....शिवसेना ने उस दौर में लोगो के बीच जाकर अपनी पैठ को जिस तरीके से मजबूत किया इसने कांग्रेस के सामने पहली बार चुनौती पेश की और महाराष्ट्र की राजनीती में सीधे दखल देकर भाजपा के साथ पहली बार गठबंधन सरकार बनाकर कांग्रेसियों के होश फाख्ता कर दिए थे.......

मराठी मानुष के जिस मुद्दे के आसरे शिव सेना ने उस दौर में बिसात बिछाई थी बहुत कम लोग शायद ये बातें जानते है उस दौर में बाला साहब ठाकरे के साथ मिलकर मनोहर जोशी ने शिवसेना का राज्य में मजबूत आधार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ..... परन्तु आज वही मनोहर जोशी पार्टी में हाशिये में है......

मनोहर जोशी ने अपने समय में ना केवल महाराष्ट्र की राजनीती में अपना एक ऊँचा मुकाम बनाया बल्कि शिवसेना का वोट बैंक बढाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.......पार्टी की भलाई के लिये उन्होंने कभी किसी पद की चाह नहीं रखी ... हाँ, ये अलग बात है पार्टी ने उन्हें जो भी काम सौपा उसे उन्होंने वफादारी के साथ पूरा किया......२ दिसम्बर १९३७ को महाराष्ट्र के एक मध्यम वर्गीय ब्रह्मण परिवार में जन्मे जोशी के राजनीतिक कैरियर की शुरुवात आपातकाल के दौर में हुई॥ उस दौर में मुंबई के मेयर की कमान उनके हाथो में रही......१९९० में शिवसेना के टिकट पर उन्होंने पहली बार विधान सभा का चुनाव जीता ...९० के दशक में भाजपा के साथ मिलकर जब शिव सेना ने राज्य में पहली बार गठबंधन सरकार बनाई तो मनोहर गजानन जोशी को राज्य के १५ वे मुख्यमंत्री की कमान मिली......इसी दौर में छगन भुजबल ने शिव सेना को अलविदा कहा था और यही से जोशी का नया सफ़र शुरू हो गया ...... इसके बाद 1999 में बाला साहब ठाकरे ने उन्हें मध्य मुंबई से चुनाव लड़ाया जहाँ से वह भारी मतों से विजयी हुए ....... इसके बाद उन्होंने शिव सेना के कद को राष्ट्रीय राजनीती में बढाया......यही वह दौर था जब जोशी को लोक सभा अध्यक्ष के पद पर बैठाया गया ..... उस दौर की यादें आज भी जेहन में बनी है ......

मनोहर के इस कार्यकाल ने लोकसभा के इतिहास में एक नयी इबादत लिख दी...... अपनी समझ बूझ से उन्होंने जिस अंदाज में लोक सभा चलायी उसकी आज भी सभी पार्टियों के नेता तारीफ किया करते थे ...... २००४ में मनोहर को पार्टी ने केंद्र में भारी ओद्योगिक मंत्री की जिम्मेदारी से नवाजा जिसे उन्होंने बड़ी शालीनता के साथ निभाया ....... लेकिन इसके बाद मनोहर के सितारे गर्दिश में चले गए... २००४ में मनोहर को कांग्रेस के एकनाथ गायकवाड के हाथो मुह की खानी पड़ी ..... इसके बाद पार्टी ने २००६ में उनको राज्य सभा में बेक डोर से संसद में इंट्री दिलवा दी..... बाला साहब ठाकरे के राजनीती से रिटायरमेंट के बाद मनोहर जोशी का राजनीतिक सिंहासन डोलने लगा...... आज हालत ये है मनोहर अपनी पार्टी में बेगाने हो चले है... पार्टी में उनकी कोई पूछ परख नहीं हो रही है......

दरअसल जब तक शिव सेना की कमान बाला साहब ठाकरे के हाथो में थी तब तक शिवसेना में मनोहर जोशी के चर्चे जोर शोर के साथ हुआ करते थे..... शिवसेना के कई कार्यकर्ता जो इस समय मनोहर के समर्थक है वो बताते है की उस दौर में अगर कोई काम निकालना होता था तो कार्यकर्ता सीधे मनोहर को रिपोर्ट करते थे ... मनोहर को रिपोर्ट करने का सीधा मतलब उस दौर में ये होता था , आपका काम किसी भी तरह हो जायेगा ... राज्य की राजनीती से केंद्र की राजनीती में पटके जाने के बाद भी उन्होंने जिस शालीनता के साथ केन्द्रीय मंत्री का दायित्व निभाया उसने सभी को उनका कायल कर दिया ...

आज हालत एक दम अलग हो गए है......शिवसेना की राजनीती पहले "मातोश्री" से तय हुआ करती थी..... बाला साहब ठाकरे के वीटो के कारन कोई उनके द्वारा लिये गए फैसले को चुनोती नहीं दे सकता था... आज आलम ये है शिव सेना दो गुटों में बात चुकी है॥ एक मनसे है जिसकी कमान राज ठाकरे के हाथो में है जो कभी शिवसेना के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिसद के प्रमुख हुआ करते थे.....बाला साहब की शिव सेना की कमान उद्धव ठाकरे के हाथो में है जो पार्टी को अपने इशारो पर चला रहे है॥ ऐसे विषम हालातो में कार्यकर्ता अपने को उपेक्षित महसूस कर रहा है...

बाला साहब के समय में पार्टी के महत्वपूर्ण फैसलों पर मनोहर की राय को कभी अनदेखा नहीं किया जाता था लेकिन आज मनोहर को उद्धव भाव तक देना पसंद नहीं करते॥ पार्टी में उन्होंने अपना नियंत्रण इस कदर स्थापित कर लिया है वह महत्वपूर्ण फैसलों पर अपनी मित्र मंडली से सलाह लेना ज्यादा पसंद करते है.....ऐसे में मनोहर जोशी के भावी भविष्य को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाये शुरू होने लगी है.....

विषम हालातो के मद्देनजर अभी मनोहर कोई बड़ा फैसला लेने से परहेज कर रहे है......समय आने पर मनोहर अपने पत्ते खोल सकते है .... वैसे बताते चले शिव सेना से इतर उनकी अन्य दलों के नेताओ से भी काफी मधुर संबध रहे है ... बाला साहब के बेटे राज ठाकरे की ही बातें करे तो उनके बेटे के जोशी के पुत्र के साथ व्यावसायिक सम्बन्ध प्रगाढ़ रहे है... यही नहीं राकपा में शरद पवार, विलास राव देशमुख ओर प्रफुल्ल पटेल जैसे नेता भी उनके बेहद करीबियों में शामिल है.... इसके मद्देनजर अगर वह शिव सेना से इतर किसी अन्य पार्टी में जाने की सोचे तो उनके पास सभी जगहों से विकल्प मौजूद है......वैसे भी २४ साल मराठी अस्मिता के आसरे वोटर को लुभाने की कला में माहिर इस "ब्राह्मण कार्ड " को कोई भी पार्टी आगे करने से नहीं डरेगी........

बहरहाल जो भी हो फिलहाल शिव सेना में मनोहर के सितारे बुलंदियों पर नहीं है .....लेकिन भावी राजनीती का रास्ता जोशी को अब खुद तय करना है..... अगर अपनी पार्टी में उनकी पूछ परख कम हो रही हैतो इसका असर उनकी भावी राजनीती में पड़ना तय है..... महाराष्ट्र के पिछले विधान सभा में भी देखने में आया था उद्धव ने उनको वो सम्मान नहीं दिया जो सम्मान बाला साहब ठाकरे दिया करते थे.....ऐसे में वो उद्धव से दूरी बनाये रखे थे लेकिन ये दूरिया कब तक बनी रहेगी यह अब बड़ा सवाल बन गया है.... दूरियों को पाटना भी जरुरी है ... आमतौर पर बेहद शांत, शालीन , ईमानदार रहने वाले मनोहर जोशी को अब आगे का रास्ता खुद तय करना है..... वैसे यकीन जानिये फिलहाल महाराष्ट्र में शिवसेना में उनकी राह में कई कटीले शूल है जिनसे पार पाने की एक बड़ी चुनोती इस समय जोशी के पास है.........देखना होगा २४ साल पार्टी की उम्मीदों पर खरा उतरे जोशी इस बार की परीक्षा में कैसा प्रदर्शन करते है?

तुष्टीकरण की शिकार रही है तस्लीमा............

तस्लीमा नसरीन...... एक जाना पहचाना नाम है.... शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इनके नाम से परिचित नहीं होगा......नसरीन का जन्म २५ अगस्त १९६२ को एक मुस्लिम परिवार में हुआ था....प्रसिद्द लेखिका नसरीन ने अपने जीवन की शुरुवात चिकित्सा के पेशे से की......१९८४ में चिकित्सा की पड़ी पूरी करने के बाद उन्होंने ८ वर्ष तक बंगलादेश के अस्पताल में काम किया .... सामाजिक गतिविधियों से जुड़े होने के बाद भी उन्होंने अपने को साहित्यिक गतिविधियों से दूर नहीं किया...... मात्र १५ वर्ष की आयु में कविता लिखकर अपनी लेखनकला की ओर सभी का ध्यान खींचा..... तस्लीमा की पहली पुस्तक १९८६ में प्रकाशित हुई.....१९८९ में वह अपनी दूसरी पुस्तक को प्रकाशित करवा पाने में सफल रही.... इसके बाद तस्लीमा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा .......

इस दूसरी पुस्तक को लिखने के बाद उनको दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों के संपादको की ओर से नियमित कॉलम लिखने के आमंत्रण आने लगे.... इस अवधि में "सैंट ज्योति" पाक्षिक पत्रिका का संपादन भी उनके द्वारा किया गया...तस्लीमा हमेशा बंगाली भाषा में लिखती रही है..... नसरीन को धर्म, संस्कृति, परम्पराव की आलोचना करने में कोई भय नहीं रखता ..... इसी कारन उनकी ६ मुख्य पुस्तके प्रतिबंधित श्रेणी में आती है जो क्रमश "लज्जा" (१९९३), अमर मेबले( १९९९), उताल हवा(२००२), को(२००३), द्विखंडितो( २००३), सी सब अंधकार (२००४) शामिल है......

तस्लीमा की पुस्तकों पर उनके गृह देश बंगलादेश में भी विरोध के स्वर मुखरित होते रहे है.... जहाँ शेख हसीना ने इन पुस्तकों को अश्लील करार दिया है वही भारत की पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने
मुस्लिम कौम की भर्त्सना करने के चलते इन पुस्तकों पर प्रतिबन्ध लगाया..... १९९२ में तस्लीमा बंगलादेश का प्रतिष्टित साहित्यिक अवार्ड "आनंदा " पाने में सफल रही.... निडर होकर धर्म के विरोध में लिखने के कारन "सोल्जर ऑफ़ इस्लामी ओर्गनाइजेशन " ने इनके खिलाफ मौत का फ़तवा जारी कर दिया.... जिसके बाद से कभी उन्होंने जनता के सामने आना पसंद नहीं किया........वह की सरकार ने उनके खिलाफ उग्र प्रदर्शनों से बचाव हेतु उनका पास पोर्ट जब्त कर लिया ओर देश से निर्वासित होने का फरमान जारी करदिया .......

२००४ में उनके खिलाफ विरोध जताने के एक मुद्दे के तौर पर यह कहा गया अगर किसी ने उनके मुह कला कर दिया तो उसको अवार्ड दिया जायेगा......बंगलादेश के धार्मिक नेता सैयद नूर रहमान तो तस्लीमा के लेखन से इतना आहत हुए उन्होंने इनको आतंकवादी संगठन जीबी का जासूस तक करार दे डाला......२००५ में अमेरिका पर लिखी गई एक कविता पर फिर से उन्हें मुस्लिम समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणिया करने के कारन खासी फजीहतें झेलनी पड़ी.......

मार्च २००५ में उत्तर प्रदेश के कुछ मुस्लिम संगठनो ने इनका सर कलम करने के लिये ६ लाख के इनाम की घोषणा की.....इसके बाद ९ अगस्त २००७ को हैदराबाद प्रेस क्लब में उनके तेलगु संस्करण शोध के विमोचन के मौके पर "मुतेह्दा मजलिस ऐ अमल" के १०० लोगो ने ३ विधान सबहहा सदस्यों के साथ इन पर हमला बोल दिया.......इस घटना पर उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा हम इस्लाम के खिलाफ लिखने ओर बोलने वाले का विरोध करते रहेंगे.... सितम्बर २००७ में तस्लीमा पर कुछ कट्टरपंथियों ने हमला बोल दिया ... भारत में इसी दौरान "अल इंडिया मईनोरिटी" फोरम ने इनके भारत रहने पर सवाल उठायेओर इन्हें भारत से निकलने की मांग की.... स्थिति को बिगड़ता हुआ देख पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सर्कार ने इनकी हिफाजत के लिये पुलिस नियुक्त की......परन्तु स्थिति नहीं संभल पायी......

२१ नवम्बर २००७ को इन्हें जयपुर ले जाया गया और रातो रात दिल्ली लाया गया.....३० नवम्बर २००७ को कट्टरपंथियों के विरोध को शांत करने के लिये तस्लीमा अपनी विवादित पुस्तक "द्विखंडितो" से ३ पन्ने हटाने को तैयार हो गई....इसके बाद तस्लीमा को उम्मीद थी तमाम विवाद उनका पीछा छोड़ देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ.... ९ जनवरी २००७ को फ्रांस सरकार ने उन्हें" सियोमन दी वियोवर" सम्मान महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिये दिया....कुछ साल पहले तक भारत सरकार ने उन्हें जयपुर में एक गुप्त स्थान में रखा जहाँ पर उन्हें किसी से मिलने की अनुमति नहीं दी गई......

भले ही नसरीन को भारत छोड़ते हुए लम्बा समय हो गया हो लेकिन आज भी वह कोलकाता को अपना घर मानती है.....तसलीमा तो भारत से चली गई लेकिन उनके जाने के बाद भारत की धर्म निरपेक्ष छवि को करार तमाचा लगा अहि.....हमारे साथ सबसे बड़ी दिक्कत यही है हम इतिहास की घटनाओ से सबक नहीं सीखते .... "सैटेनिक वर्सेज" जिस दौर में रुश्दी ने लिखा तो पूरे इस्लाम जगत में हलचल मच गई ऐसे समय में ब्रिटेन ने रुश्दी को व्यापक सुरक्षा मुहैया करवाईलेकिन एक हम है जो अतिथि देवो भवः का दंभ भरते है ओर किसी शरानाठी को ठीक से सुरक्षा भी नहीं दे सकते.....

Sunday, August 14, 2011

भारतीय राजनीती में गहरा रहा है परिवारवाद........

हमारे देश की राजनीती में परिवारवाद तेजी से गहराता जा रहा है.....जिस तेजी से परिवारवाद यहाँ पैर पसार रहा है उसके हिसाब से वह दिन दूर नहीं जब देश में कोई भी ऐसा नेता मिलना मुश्किल हो जायेगा जिसका कोई करीबी रिश्तेदार राजनीती में नहीं हो .....
राजनीतिक परिवारों के लिये भारतीय राजनीती से ज्यादा उर्वरक जमीन पूरे विश्व में कही नहीं है.....आज का समय अब ऐसा हो गया है राजनीती का कारोबार सभी को पसंद आने लगा है ॥ तभी सभी अपने नाते रिश्तेदारों को राजनीती में लाने लगे है....ऐसे हालातो में वो लोग" साइड लाइन" होने लगे है जिन्होंने किसी दौर में पार्टी के लिये पूरे मनोयोग से काम किया था...
आज के समय में नेताओ का पुत्र होने लाभ का सौदा है .... अगर आप किसी नेता के पुत्र है तो सारा प्रशासनिक अमला आपके साथ रहेगा ........यहाँ तक की मीडिया भी आपकी ही चरण वंदना करेगा ....अगर खुशकिस्मती से आप अपने रिश्तेदारों की वजह से टिकट पा गए तो समझ लीजिये आपको कुछ करने की जरुरत है ..... चूँकि आपके रिश्तेदार किसी पार्टी से जुड़े है इसलिए उनके साथ कार्यकर्ताओ की जो फ़ौज खड़ी है वो खुद आपके साथ चली आएगी......
इन सब बातो के मद्देनजर वो कार्यकर्ता अपने को ठगा महसूस करता है जिसने अपना पूरा जीवन पार्टी की सेवा में लगा दिया... धीरे धीरे भारतीय राजनीती अब इसी दिशा में आगे बढ़ रही है .....
राजनीती में गहराते जा रहे इस वंशवाद को अगर नहीं रोका गया तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे लोकतंत्र का जनाजा ये परिवारवाद निकाल देगा .......भारतीय राजनीती आज जिस मुकाम पर कड़ी है अगर उस पर नजर डाले तो हम पाएंगे आज राष्ट्रीय दल से लेकर प्रादेशिक दल भी इसे अपने आगोश में ले चुके है..... कांग्रेस पर राजनीतिक परिवारवादी बीजो को रोपने का आरोप शुरू से लगता रहा है लेकिन आज आलम यह है कल तक परिवारवाद को कोसने वाले नेता भी आज अपने बच्चो को परिवारवाद के गर्त में धकेलते जा रहे है..... देश की मुख्या विपक्षी पार्टी भाजपा में भी आज यही हाल है ... उसके अधिकांश नेता आज परिवारवाद की वकालत कर रहे है....."हमाम में सभी नंगे है" कमोवेश यही हालात देश के अन्य राजनीतिक दलों में भी है........
भारतीय राजनीती में इस वंशवाद को बढाने में हमारा भी एक बढ़ा योगदान है.....संसदीय लोकतंत्र में सत्ता की चाबी वैसे तो जनता के हाथ रहती है लेकिन हमारी सोच भी परिवारवाद के इर्द गिर्द ही घुमा करती है .... वह सम्बन्धित व्यक्ति के नाते रिश्तेदार को देखकर वोट दिया करती है....जबकि सच्चाई ये है , चुनाव में राजनीतिक परिवारवाद से कदम बढ़ने वाले अधिकाश लोगो के पास देश दुनिया ओर आम आदमी की समस्याओ से कोई वास्ता ओर सरोकार नहीं होता ......वो तो शुक्र है ये लोग अपने पारिवारिक बैक ग्राउंड के चलते राजनीती में अपनी साख जमा लेते है ......

ऐसे लोगो ने भारतीय राजनीती को व्यवसाय बना लिया है .......जहाँ पर उनकी नजरे केवल मुनाफे पर आ टिकी है.....इसी के चलते आज वे किसी भी आम आदमी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहते......वन्स्वाद अगर इसी तरह से अगर आगे बढ़ता रहा तो आम आदमी का राजनीती में प्रवेश करने का सपना सपना बनकर रह जायेगा ........परिवारवाद को बढाने वाले कुछ लोगो ने राजनीती को अपनी बपोती बना कर रख दिया है......यही लोग है जिनके कारन आज "जन लोकपाल " बिल पारित नहीं हो पा रहा है.... अन्ना सरीखे लोगो ने आज इन्ही की बादशाहत को खुली चुनोती दे दी है ......जिसके चलते खुद को सत्ता का मठाधीश समझने वाले इन नेताओ का सिंहासन आज खतरे में पड़ता दिखाई दे रहा है.........

Thursday, September 9, 2010

हवाई अड्डे के लिये नवी मुंबई का नया नक्शा तैयार

महाराष्ट्र सरकार नवी मुंबई इलाको का एक नया नक्शा केंद्र सरकार को सौपेंगी जिससे वहां हवाई अड्डे के अनुमोदन की प्रक्रिया में तेजी आएगी नवी मुंबई का नक्शा इससे पहले १९९५ में तैयार किया गया था जिसे हवाई अड्डे की योजना में शामिल किया गया थालेकिन केंद्र सरकार की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने वहां लम्बे समय से कड़ा ऐतराज जताया था शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारी ने आज कहा की नया नक्शा अन्ना विश्व विद्यालय द्वारा तैयार किया गया है जो केंद्र सरकार के तटीय मानचित्र सेल द्वारा अधिकृत हैउन्होंने कहा नक़्शे को एमसी जेड एम ऐ मुंबई की एक बैठक में मंजूरी दी गई नए नक़्शे में सी आर जेड इलाके के साथ ही मैन्ग्रोव को बदा दिया गया है क्युकि एक इलाके में नदियों की बाद से ज्वारीय और पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण पानी का स्तरकाफी ऊपर चला गया है पुराने नक़्शे को १/२५००० के पैमाने पर पूरा किया गया है वही नए नक़्शे का पैमाना १/४००० है जिसमे सभी सीमाओ का सीमांकन किया गया है केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राज्य सरकार को लिखा है कि विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति द्वारा २२ सितम्बर के बाद हवाई अड्डे की साईट का दौर किया जाएगा

Tuesday, September 7, 2010

खबर हो खली तो टी आर पी महाबली.......

खबरिया चैनलों की भीड़ में हिन्दी चैनलों से जनसरोकारो वाली खबरे मीडिया से दूर होती जा रही है... खासतौर से भारतीय इलेक्ट्रोनिक मीडिया में जिस तरीके से आजकल खबरों को परोसा जा रहा है वह काफी चिंताजनक है ... अगर एन डी टी वी को छोड़ दिया जाए तो अन्य चैनल खबरों के मामले में मनोरंजन परोस रहे है.... आजादी के बाद हिन्दी पत्रकारिता ने एक नयी अलख जगाई थी... उस दौर में पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी लेकिन समय बदलने के साथ आज की पत्रकारिता बाजार के दबाव में व्यवसायिक हो गई..... ९० के दशक में भारत में खबरिया चैनलों का आगाज हुआ....देखते देखते चैनलों की संख्या बदती गई... एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ के चलते चैनलों से जनसरोकारो वाली खबरे गायब होती जा रही है.... चैनल खबरों के नाम पर मनोरंजन , सनसनी को परोस रहे है....
आज के हिन्दी के खबरिया चैनल खबरों के नाम पर थ्री सी सिनेमा , क्रिकेट ओर सेलेब्रिटी को परोस रहे है.... यही नहीं खबरिया चैनल व्यक्ति की निजी जिन्दगी पर भी खबरे चटपटे अंदाज में दे रहे है....
एक आरुषीकी मौत हो जाती है तो उसकी मौत पर सारा मीडिया बावला हो जाता है.... जबकि आरुषी जैसी कई लड़कियां कोख में जन्म लेने से पहले मार दी जाती है लेकिन हिंदी के खबरिया चैनलों को इससे कोई सरोकार नहीं है.....खबरों को मिर्च मसाले का तड़का देने के चक्कर में भूत प्रेत कंकाल वाली टी वी की हिंदी पत्रकारिता में इजाफा होता जा रहा है .... एक बच्चा अगर कही गिर जाए तो मीडिया उस पर खबरे बनाने में पीछे नहीं रहता लेकिन असलियत ये है सारे मामले मेट्रो के रहते है इसलिए मीडिया इनको तवज्जो देता है जबकि ग्रामीण इलाको में ऐसी घटनाये आये दिन घटती रहती है जिन पर हमारे खबरिया चैनलों की नजर नहीं जा पाती है... आज के खबरिया चैनलों से गाव का किसान गायब हो गया है ... पिछले तीन सालो में लाखो किसानो ने आत्महत्या की लेकिन उनकी खबरे मीडिया से नहीं आ सकी .....आमिर खान की "पीपली लाइव" में एक नत्था फिल्म चलने के बाद सारे मीडिया के सर चढ़ जाता है लेकिन नत्था जैसे कई किसानो पर मीडिया का कोई फोकस नहीं होता है...
इन दिनों हिंदी के मीडिया चैनलों में एक नया चलन चल गया है... कोई रफ़्तार से ५ मिनट में २५ खबरे दिखा रहा है तो कोई फटाफट में ४० खबरे दे रहा है ... हिंदी न्यूज़ चैनलों की माने तो ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि दर्शक खबरों से जुड़े रहे ... वैसे भी आज के समय में खबरिया चैनलों के दर्शक के पास इतना समय नहीं है वह देश दुनिया की खबरे देख सके लिहाजा उनका ये नया कांसेप्ट भी दर्शको को रास नहीं आ रहा है ... खबरे इतनी तेजी से फ्लैश हो जाती है ५ मिनट के बाद दर्शक को ये ध्यान भी नहीं रहता उसने कितनी खबरे देख ली है...
खबरिया हिंदी चैनलों में आजकल किसी मसले पर व्यापक पड़ताल भी नहीं हो रही ...हर किसी से आगे निकलने की होड़ इतनी तेज है आज खबरों की वास्तविकता से रिपोर्टरों का कुछ भी लेना देना नहीं है..... चैनलों में बड़े पदों पर बैठे लोगो को टी आर पी से मतलब होता है ...जिस चैनल की टी आर पी जितना ज्यादा होगी उस चैनल को उतने ज्यादा विज्ञापन मिलेगे.... माना आज के समय में व्यावसायिकता का बोलबाला है लेकिन हिंदी चैनल जनसरोकारो वाली खबरों को अलग नहीं रख सकते.... हिंदी चैनलों को राखी सावंत की चुम्मा बेचने ओर हंसी के रसगुल्ले बेचने से ही फुर्सत नहीं है ...
मीडिया के बहुत से विश्लेषको का मानना है भारतीय खबरिया चैनल अभी शैशव काल में है इसी के चलते आम आदमी के सरोकार टी वी के हिंदी चैनलों से दूर होते जा रहे है.... बेंजामिन ब्रेडली पत्रकारिता जगत का एक बहुत बड़ा नाम है.... शेखर गुप्ता एक बार जब अपने चैनल में उनका साक्षात्कार कर रहे थे तो उन्होंने एक बात बहुत अच्छी कही ... उन्होंने कहा था अमेरिका में आज के समय में अखबार पड़ने वाले दर्शको की संख्या में तेजी से कमी आते जा रही है ....लेकिन उन्होंने कहा अब वहां की टीवी पत्रकारिता बुनियादी मुद्दों की ओर लौट रही है ... अगर इसको आधार बनाये तो हम भारत में खबरिया चैनलों से भी इस बात की उम्मीद कर सकते है कुछ समय बाद भारत के हिंदी के खबरिया चैनलों में भी ये चलन देखने को मिल सकता है ...आखिर जब अपने घर में खाने को नहीं होगा तो कब तक राखी सावंत की चुम्मा , राजू श्रीवास्तव के हंसी के फब्बारे बेचते रहेंगे......
पंक्तिया सटीक है -----
"एक समय आयेगा जब पत्थर भी गाना गायेगा
मेरे बाग़ का फूल फिर से खिल खिलायेगा "

--------------- हर्षवर्धन पाण्डे

Monday, September 6, 2010

भाजपा विधायक दीनू सोलंकी के चचेरे भाई शिव सोलंकी को गुरुवार को राजकोट एयर पोर्ट में आर टी आई एक्टिविस्ट अमित जेठवा की हत्या के सिलसिले में गुजरात पोलिसे ने गिरफ्तार किया.... क्राईम ब्रांच के चीफ मोहन झा ने बताया की शिव सोलंकी को पोलिसे ने उस समय गिरफ्तार किया जिस समय वे मुंबई के लिए रवाना होने वाले थे ....जित्व के कुछ दिन पहले हाई कोर्ट में गिर वन इलाके में अवैध खनन के खिलाफ एक जन हित याचिका दायर की थी जिसके बाद मोटर साइकिल में सवार दो लोगो ने उनकी हत्या कर दी थी....उनके पिता भीखाभाई जेठवा ने बेटे की हत्या के पीछे जूनागढ़ से भाजपा विधायक की हाथ होने की आशंका जताई है......



पहली बार जम्मू सुरक्षाकर्मियों एक
एकe जम्मू में एकe जायदा नागरिको को मारा.......



केंद्र सरकार जम्मू में जारी हिंसा को कम करने के लिए