Wednesday, February 4, 2009

ऑस्कर की ओर बदते "स्लम डॉग" के कदम .... ........

रहमान के "गोल्डन ग्लोब" जीतने के बाद विश्व भर में "स्लमडॉग मिलेनियर" खासी सुर्खियों में आ गई है..... एक साथ ४ गोल्डन ग्लोब जीतना किसी भी फ़िल्म निर्माता के लिए एक बड़ी उपलब्धि है...इसको सही से साकार किया है " डैनी बोयल " ने... डैनी एक विदेशी फ़िल्म निर्देशक है.... उनकी स्लम डॉग अब भारत में भी रिलीज़ हो गई है... रहमान के गोल्डन ग्लोब जीतने के बाद से ही हमारे देश में जश्न का माहौल बन गया था ...यही कारण था वह भारत में फ़िल्म के रिलीज़ होने की प्रतीक्षा करते रहे... यह उत्साह उस समय दुगना हो गया जब स्लम डॉग को ऑस्कर के लिए १० नामांकन मिल गए...मीडिया रहमान का गुणगान करने में लग गया .... डैनी का भी देश विदेशों में जोर शोर से नाम गूजा.... अभी डैनी की सफलता में एक अध्याय उस समय जुड़ गया जब अमेरिका में एक और अवार्ड बीते दिनों उनकी झोली में चले गया...


जहाँ तक फ़िल्म की कहानी की बात है तो इस फ़िल्म का कथानक "विकास स्वरूप " के भारतीय उपन्यास "क्यू एंड ए" पर आधारित है विकास ने २००३ में यह उपन्यास लिखा था जिसका ३५ भाषाओ में अनुवाद हो चुका है इस उपन्यास ने विकास को बहुत चर्चित बना दिया है विकास भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी है जिनकी इस कृति को अफ्रीका में " बोआयाकी " सम्मान से भी नवाजा जा चुका है... अब स्लम डॉग की धूम के बाद उनके इस उपन्यास की बिक्री मार्केट में तेजी से बढ गई है स्लम डॉग सच्चे भारत की तस्वीर को बयां करती है लेकिन भारत के एक बड़े वर्ग को चमचमाते भारत की यह बुलंद तस्वीर रास नही आ रही है इस कारण से यह फ़िल्म विवादों में घिरती जा रही हैकुछ लोगो का मानना है कि इस फ़िल्म में भारत की गरीबी ओर झोपडियो का जीवन मसालेदार अंदाज में फिल्माया है जिस कारण पश्चिम में इसके चाहने वालो की संख्या बढ रही है

वैसे तो यह फ़िल्म विकास के उपन्यास पर आधारित है लेकिन इसकी कहानी उससे हूबहू मेल नही खाती विकास के उपन्यास का नायक जहाँ " राम थॉमस है वही डैनी का नायक "जमाल" है इसी तरह से राम की प्रेमिका उपन्यास में जहाँ नीता है , फ़िल्म में यह "लतिका " है उपन्यास की कहानी कुछ और ही बयां करती है उसमे दिखाया गया है किस प्रकार से धारावी में पला राम नाम का युवक शो शुरू होने के कुछ हफ्ते पहले ही एक अरब की मोटी रकम जीत जाता है लेकिन यहाँ पर एक नई समस्या शो के आयोजकों के सामने आजाती है जब उनके पास राम को देने के लिए रकम नही होती हैअतः वह राम को जालसाज साबित करने में लग जाते है इस दरमियान एक महिला वकील उसकी मदद करने को आगे आती है यह सब फ़िल्म में नही है जो भी हो इस फ़िल्म को देखने के बाद बुलंद भारत की असली तस्वीर देखीजा सकती है आज भी भारत की एक बड़ी आबादी स्लम में रहती है उनका गुजर बसर किस तरह से होता है यह सब हम इस फ़िल्म में देख सकते है गरीबी को लेकर चाहे कुछ भी कहा जा रहा हो लेकिन यह भारत की एक सच्चाई है हम इसको नकार नही सकते आज भी देश की बड़ी आबादी भूख और बेगारी से जूझ रही है उसे दो जून की रोटी भी सही से नसीब नही होती.... इसको पाने के लिए हाड मांस एक करना पड़ता है

फ़िल्म की कहानी "जमाल " और " सलीम" नमक दो युवको के इर्द गिर्द घूमती है स्लम डॉग दोनों की बचपन से जवानी तक के सफर की असली हकीकत को बयां करती हैफ़िल्म में दिखाया गया है एक अदना सा दिखने वाला युवक "जमाल" किस तरह से २ करोड़ जीत जाता हैदोनों के बचपन की दास्ताँ दर्द भरी है बचपन में दंगो की आग में इनकी माँ का कत्ल हो गया जिसके चलते अलग राह पकड़ने को मजबूर होना पड़ा दंगो के बाद दोनों युवक अंडरवर्ल्ड के शिकंजे में फस जाते है जिसमे उनकी सखी लतिका भी शामिलहो जाती है दोनों इसके चंगुल से छूट जाते है लेकिन लतिका वही की वही फस जाती है देश में बच्चो के अपहरण करने वालो का गिरोह किस कदर सक्रिय है यह फ़िल्म में दिखाया गया है वह बच्चो से अपने मुताबिक काम कराने से कोई गुरेज नही करता वहां से भागने के बाद जमाल की राह तो अलग हो जाती है लेकिन सलीम फिर से गिरोह वालो के चंगुल में फस जाता है जहाँ पर लतिका भी उसके साथ है बाद में जमाल केबीसी के शो में भाग लेता है जहाँ पर सभी सवालों के जवाब देकर वह "मिलेनियर " बन जाता है लेकिन लोग इस बात को नही पचा पाते की कैसे स्लम से आने वाला एक युवक सही जवाब दे देता है ? लेकिन "जमाल" अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर सवालो के जवाब दे देता है अन्तिम सवाल पूछने से पहले पुलिस उसको प्रताडित करने से बाज नही आती लेकिन जमाल का आत्मविश्वास देखते ही बनता है उसकी माने तो "मुझे जवाब आता है" पुलिस उसको पकड़कर इस पहेली का हल खोजने की कोशिस करती है लेकिन उसको सफलता नही मिल पाती "जमाल" के भाग्य में करोड़पति बनना लिखा होता है वह बनकर रहता है
जहाँ फ़िल्म में छोटे जमाल की भूमिका में आयुस उतरे है वही देव पटेल ने बड़े जमाल की भूमिका निभाई है छोटे जमाल के द्वारा किया गया एक शोट ध्यान खीचता है जिसमे जमाल अपने प्रिय अभिनेता " बिग बी " के दर्शनों को पाने के लिए इस कदर बेताब रहता है की वह "गटर" में छलांग लगाकर भीड़ में अपने अंकल के ऑटो ग्राप के लिए हेलीकाप्टर के पास दोड़ता है इरफान खान, अनिल कपूर, फ्रीदा पिंटो का अभिनय भी फ़िल्म में लाजावाब है गुलजार के गाने झूमने को मजबूर कर देते है साथ ही अपने "रहमान " का तो क्या कहना .... जय हो जय हो .... हाथी घोड़ा पालकी जय बोलो रहमान की .....रहमान के संगीत की प्रशंसा में शब्द नही है .... इस बार ऑस्कर पाने की उनसे आशाए है सभी को ... अब २२ फरवरी का इंतजार है .... दिल थामकर बैठिये... सब्र का फल मीठा होता है .....अगर उनको यह मिल जात है तो वह पहले भारतीय होंगे जिसने किसी विदेशी की फ़िल्म में काम कर इसको पाया १० नामांकनों पर सबकी नजरें लगी है भारत में जो लोग स्लम डॉग की आलोचना कर रहे है उनको यह सोचना चाहिए सच्चाई से आप अपने को अलग नही कर सकते ... असली हिंदुस्तान फुटपाथ पर आबाद है सबसे दुःख की बात तो यह है स्लम डॉग भारत का उपन्यास है और इस पर फ़िल्म विदेशी बना रहा है एक सवाल जो हमको बार बार कचोट रहा है वह यह है हमारे " होलीवूड " वाले कब तक "प्यार के फंडो" पर बन रही फिल्मो से इतर सोचना शुरू करेंगे ? इस लीक से हटकर सोचने का माद्दा हमारे यहाँ ले देकर एक व्यक्ति ने निभाया है उसका नाम सत्यजीत ... सत्यजीत ने इस नब्ज को अपनी फिल्मो में सही से पकड़ा लेकिन इसके चलते उनको भी आलोचना का शिकार होना पड़ा था नरगिस के द्वारा पहले भी सत्य जीत राय की फिल्मो की आलोचना की जाती रही है उनका मानना था भारत की गरीबी को सत्य जीत विदेशों में बेच कर आते .... खैर जो भी हो हाल के कुछ वर्षो में भारत का नाम ऊँचा हुआ है॥ अपने "अरविन्द ओडीगा " व्हाइट टायगर " पर पुरस्कार जीतकर भारत का झंडा बुलंद कर चुके ... अब बारी विकास के उपन्यास की है .... क्या हुआ ऑस्कर अगर स्लम डॉग को ही मिले उसकी कहानी तो स्वरूप की ही .......

Monday, January 26, 2009

अगाध आस्था और विश्वास का केन्द्र ऋषे श्वर महादेव ......



उत्तराखंड के पग पग पर देवालयों की कतारे है इसी कारण यहाँ की धरा को देवभूमि की संज्ञा से नवाजा गया है अपने बहुत से धार्मिक कार्यो के द्वारा यहाँ की भूमि को अनेक ऋषियों ने धन्य कियाहै कई साधू महात्माओ ने तो आजीवन यहाँ जनम पाने की आकांशा लिए समाधी तक ली है प्राचीन समय से ही यहाँ के पौराणिक धर्म स्थलों के प्रति आम जनमानस की गहरी रूचि रही है आज भी यहाँ के देवालयों में आने वाला हर एक भक्त एक अमित छाप लेकर जाता है और बार बार यहाँ आने की कामना करता है निराश प्राणी यहाँ आकर सुख शान्ति की अनुभूति करता है एक तरह से यहाँ की वादियों में डेरा जमाकर व्यक्ति परम पिता प्रभु के दर्शनों की आस में अपना तन मन समर्पित कर देता है उसके मन में किसी भी तरह से अनंत ब्रहम के दर्शनों की जिज्ञासा जाग उठती है

उत्तराखंड का सीमान्त जनपद चम्पावत अपने प्राकृतिक सौन्दर्य और रमणीयता के लिए प्रसिद्ध रहा है यहाँ पर मौजूद बहुत सारे पौराणिक स्थल इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगाते है यहाँ पर जहाँ पूर्णागिरी माता का चमत्कारिक मन्दिर है, वहीँ री टा साहब जैसे सर्व धर्म समभाव वाले स्थल भी है चम्पावत जनपद में बालेश्वर , नागनाथ जैसे मन्दिर भी है जो इसका महत्त्व बताते है ,विश्व प्रसिद्ध "बग्वाल" मेला भी यहीं होता है जिसमे पत्थर युद्ध होता है माता बाराही का मन्दिर विश्व में अपनी ख्याति पाए हुए है

चम्पावत से तकरीबन १२ किलो मीटर की दूरी पर लोहाघाट नगर स्थित है चम्पावत से लोहाघाट आने पर ऋषे श्वर महादेव का अनुपम देवालय पर्यटकों का मन मोह लेता है देव शिव शंकर की यह तपस्थली चारो दिशाओ से देवदार के सघन वनों से भरी पड़ी है ऐसा माना जाता है की यहाँ पर सप्त ऋषियों ने सतयुग में तपस्या कर भोलेशंकर भगवान् को प्रसन्न किया था तब शिव शंकर यहाँ प्रकट हुए थे , तभी से लोगो में इसके प्रति आस्था बनीं हुई है जन शुत्रियो के अनुसार यह भी माना जाता है , यहाँ पर शिव शंकर भगवान् अपने अपने भक्त बाणासुर की रक्षा करने को प्रकट हुए थे और यहीं पर उन्होंने बाणासुर को अपराजेय होने का वर दिया था जो आगे चलकर उसके लिए कई बार लाभकारी साबित हुआ शिव से अजेय वर पाकर बाणासुर अपने को अपराजेय समझने लगा था

किन्दवंतिया है की इस वर को पाने के बाद बाणासुर युद्ध के मोर्चे पर हर किसी दो दो हाथ करने की ठानता है ,लेकिन कोई वीर सूरमा उसके कद के लिए नही मिल ता है और वह उसे वर दान देकर अपराजेय बनने वाले शिव शंकर भगवान से ही युद्ध करने की ठान लेता है शिव बाणासुर के घमंड को देखकर उससे रणभूमि में युद्ध करने को तैयार होते है परन्तु पार्वती उनको ऐसा करने से रोक लेती है अपनी पत्नी के आदेश पर अब शिव बाणासुर से कहते है जिस दिन महल के ऊपर की धवजा धरती पर गिरेगी उसी दिन तुमसे दो दो हाथ करने को कोई तैयार होगा ऐसा माना जाता है आगे चलकर उस के गिरने पर कृष्ण के साथ शिव का युद्ध हो जाता है तब बाणासुर की रक्षा करने को शिव आते है युद्ध इतना भयानक होता है की खून की धाराए बहने लगती है खून की धाराएं नदी का रूप धारण कर लेती है इसी नदी को"लोहावती" नदी कहा जाता है जो मन्दिर के पास से बहती है बाद में शिव के आग्रह पर कृष्ण बाणासुर को छोड़ देते है और स्वयं कैलाश में चले जाते है लोगो का मानना है की शंकर यहाँ आने से पहले अपने कुछ बेताल और भेरव को यहाँ छोड़ जाते है जो यहाँ शिव लिंग अपने आराध्य देव के लिए स्थापित कर जाते है , जिसकी आगे चलकर पूजा की जाती है वर्त्तमान में इसी लिंग ने ताबे में स्थान ग्रहण कर लिया है फिर भी इस शिव लिंग की स्थापना कैसे हुई इस विषय में लोगो में एका नही है?




मन्दिर बहुत से चमत्कारों से भरा है स्थानीय पुजारी कहते है पुराने समय में अंग्रेजो के काल में भी मन्दिर कई चमक्तारो का साक्षी रहा है बताते है एक बार एक अंग्रेज ने मन्दिर में गर्दन बना दिया और गेट पर ताला दाल दिया उस समय देवता अवतरित हुए थे यह शक्ति "डंगरिया" पर आई थी ताला लगने के बाद जब वह डंगरिया देव के रूप में मन्दिर में आया तो उसने "चावल के " दाने फैककर ताले को अलग कर दिया सच में वह अद्भुत चमत्कार था इस सकती को देखकर अंग्रेज भी महादेव के आगे नतमस्तक हो गएऔर ताबे का कलश मन्दिर में चदाया तभी से यहाँ पर विशाल शिव लिंग विराजमान है कुछ लोगो का मानना है की पास में शव विसर्जन के लिए घाट होने के कारण किसी दिव्य "भूत पिसाच का भी वास है परन्तु यह सभी शिव के गन के रूप में जाने जाते है

ने मन्दिर के पास बकरी की बलि पुजारी के आदेश की अवहेलनाकर ली पुजारी के लाख विनय करने के बाद उसने किसी की एक नही सुनी तभी शिव शंकर उससे गुस्सा हो गएऔर की शुरूवात घनघोर बारिस से हुईजिसने पास में चल रहे निर्माण कार्यो को भारी हानि पहुचायीऔर सवयम वह मुस्लिम युवक अपना मानसिक संतुलन खो बैठा कहा जाता है आगे चलकर शिव ने उसको माफ्ह किया और उस युवक ने अपने जीवन के शेष बसंत शिव अर्चन में अर्पित कर दिए तभी से मन्दिर के प्रति लोगो में गहरी आस्था उभरनी शुरू हुई लोहाघाट में इस मन्दिर को सभी मनो रथो को पूरा करने वाला जाना जाता है यहाँ की पूजा के द्वारा मनुष्य के सारे कार्य पूरे हो जाते है

मन्दिर को विकशित करने में श्री श्री १०८ स्वामीजी हीरानंद जी महाराज का बहुत योगदान है वह पिचले ३४ वर्षो से यहाँ पर साधना में तल्लीन है समय समय पर यहाँ पर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता रहा हैनवरात्रियों में भी यहाँ पर भक्तो की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है उत्तराखंड में पौराणिक स्थानों की भारी भरमार मौजूद है वर्त्तमान खंडूरी सरकार के कार्यकाल में तीर्थाटन और धर्मस्व मंतरालय भी बनाया गया है ,परन्तु सरकार की भारी उपेक्सके चलते आज ऐसे धार्मिक स्थल उपेक्षित पड़े हैसरकार को आज जरूरत है की ऋषि स्वर सरीखे धार्मिक स्थलों को लेकर कोई नीति बनाये कोलिधेक निवासी "चंचल सिंह ढेक" कहते है "
इस मन्दिर की चमत्कारिक देखते ही बनती हैयहाँ पर आने वल्का हर पर्यटक एक अमित याद को लेकर जाता है सरकार को चाहिए वह ऐसे स्थलों अपनी प्राथामिकताओ में शामिल करे जिससे इस स्थान की कीर्ती दूर दूर तक फेल सकती है ............

Thursday, October 9, 2008

bagal me jo bhi hoga .. likha jaayega

हिमालय की गोद में बसा सीमान्त जनपद पिथोरागढ़ प्राकृतिक सौन्दर्य से लबालब भरा पड़ा है.... अपनी मनमोहक प्राकृतिक सुषमा के कारण यह जनपद "मिनी कश्मीर" नाम से भी जाना जाता है... दूर दूर तक फेलीहरी भरी पहाडिया और हिम से ढके शिखर बरबस ही पर्यटकों का मन मोह लेते है ... जनपद में स्थित अटूट आस्था और विश्वास के केन्द्र रहे मंदिरों की ख्याति दूर दूर तक फेली है जिस कारण भक्तजन माता के दरबार में आकर एक बार मनोती अवश्य ही मनाते है .... रमणीक वादियों और पर्वत मालाओ के बीच माता का मन्दिर स्थित है ... अटूट आस्था और भक्ति का यह केन्द्र अध्यात्मिक शान्ति के साथ प्रकृति से सीधे संवाद कायम कराता प्रतीत होता है ...इस कारण भक्त दूर दूर से माता जी के दर्शनों को यहाँ पहुचते है .... उपवासों , त्योहारों , धार्मिक पर्वो पर समीप वर्ती ग्रामीण अंचलो से बड़ी संख्या में भक्त यहाँ आकर पूजा अर्चना करते है और मन्नते मांगते है ....


जनपद मुख्यालय से सटे छावनी एरिया और कुसोली गाव के मध्य में स्थित माता जी का यह दरबार पिथोरागढ़ में खासी प्रसिद्धी पाये हुए है ...माता के इस दरबार तक पहुचने में भक्तो को खासी परेशानियों का सामना नही करना पड़ता है ....जनपद मुख्यालय से सटे कुछ किलो मीटर की दूरी पर स्थित केंट एरिया हेतु हर समय वाहनों की सेवा रहती है... वाहन से कुछ दूरी उतरकर यहाँ से थोडी चदायी चदकर भक्त आस्था के इस पवन केन्द्र तक पहुच सकते है , जहाँ माता के दर्शनों से आत्मिक सुख शान्ति मिलती है ....

स्थानीय लोग बताते है इस मन्दिर की स्थापना वर्ष १९७२ में मदन मोहन शर्मा के प्रयासों से हुई ...... तब मन्दिर का स्वरूप बहुत छोटा था... किंतु स्थानीय धर्म प्रेमी जनता के प्रयासों से अभी कुछ वर्षो में मन्दिर ने काफी विशाल स्वरूप को ग्रहण कर लिया है... मन्दिर के विस्तारीकरण में वास्तुकार डी शाह ने महत्वपूरण योगदान दिया है ... वह उत्तराखंड के प्रसिद्ध वास्तुकार रहे है...

मन्दिर का प्रवेश द्वार बंगला शेली में बनाया गया है... जो बहुत खूबसूरत दिखाई देता है... यहाँ के मन्दिर की वास्तुकला यहाँ आने वाले हर भक्क्त का मन मोह लेती है... मन्दिर में माता की विशाल प्रतिमा लगायी गई है ...जिसके दर्शन भक्त दूर से कर सकते है... मन्दिर की दीवारों में की गई नक्कासी , संस्कृत में लिखे गए श्लोक , आरतिया हर भक्त के मन को खुश कर देती है... मन्दिर में भेरव देवता , बजरंग बली जी की मूर्तिया भी स्थापित की गई है...मन्दिर में भजन कीर्तन के पर्याप्त स्थान के अलावा यज्ञशाला का निर्माण भी किया गया है.... यज्ञशाला के उपर प्राकृतिक रोशनी को शीशे लगवाये गए है ...मन्दिर परिसर से हवाई पट्टी के दृश्य देखकर काफी सुकून मिलता है... साथ ही यहाँ जाकर आपको नैनी सेनी गाव का विहंगम दृस्य भी देखने को मिलता है...यहाँ पर आकर मन को शान्ति मिलती है... मंद मंद बहने वाली हवा जब चलती है तो ऐसा लगता हैयही बस जाया जाए....भक्तो में माता के प्रति अगाध आस्था और विश्वास बना है.... इसका कारन यह हैमाता के दरबार की शीतलता मन को तृप्त कर देती है ... छावनी एरिया से लगे होने के कारन सेना के जवानों में माता के दर्शनों की भारी होड लगी रहती है..... जवान माता को एक अराध्य देवी के रूप में मानते है इस कारन से दूर दूर से आर्मी के जवान यहाँ आकर मन्नते मांगते है ... वैसे भी मन्दिर निर्माण में ६९ ब्रिगेड का खासा योगदान रहा है.... मन्दिर के रख रखाव में भी सेना के कुमाऊ रेजिमेंट के जवानों का खासा योगदान है...

कुछ वर्षो पहले तक यहाँ पर सावन मास , नवरातो , धार्मिक आयोजनों में ही भीड़ लगी रहती थीलेकिन हाल के कुछ समय से भक्तो की आवाजाही यहाँ दिन रात लगी रहती है...मन्दिर के प्रवेश द्वार से नीचे एक छोटा सा मन्दिर है...जहाँ पर विशाल शिव लिंग का निर्माण किया गया है... यदि राज्य सरकार मन्दिर के सौन्दर्यीकरण , विस्तारीकरण की दिशा में धयान दे तो यह स्थल अध्यात्मिक केन्द्र के रूप में पर्यटन मानचित्र में अपनी जगह बनने में सफल हो सकता है....लोगो को उत्तरखंड के पर्यटन मंत्री "प्रकाश पन्त " से इस दिशा में कई उम्मीद है लेकिन अभी तक सरकार ने इस दिशा में कोई कारगर पहल नही की है जिस कारन लोगो में निरासा है...

कुछ समय पहले जब मेरा उत्तराखंड जाना हुआ तो यहाँ कुछ दिनों तक रुकना हुआ.... इस दौरान मन्दिर में कई भक्तो से भी मुलाकात हुई....मन्दिर बाबत पूछने पर पिथोरागढ़ सुवाकोट के रहने वाले युवा "राजेंद्र "( गुड्डू) ने बताया की राज्य सरकार को पर्यटन के लिहाज से कारगर पहल करने की जरूरत है जिससे देव भूमि के कई सुंदर मंदिरों की गूंज दूर दूर तक फेलेगी......