Thursday, September 9, 2010
महाराष्ट्र सरकार नवी मुंबई इलाको का एक नया नक्शा केंद्र सरकार को सौपेंगी जिससे वहां हवाई अड्डे के अनुमोदन की प्रक्रिया में तेजी आएगी नवी मुंबई का नक्शा इससे पहले १९९५ में तैयार किया गया था जिसे हवाई अड्डे की योजना में शामिल किया गया थालेकिन केंद्र सरकार की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने वहां लम्बे समय से कड़ा ऐतराज जताया था शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारी ने आज कहा की नया नक्शा अन्ना विश्व विद्यालय द्वारा तैयार किया गया है जो केंद्र सरकार के तटीय मानचित्र सेल द्वारा अधिकृत हैउन्होंने कहा नक़्शे को एमसी जेड एम ऐ मुंबई की एक बैठक में मंजूरी दी गई नए नक़्शे में सी आर जेड इलाके के साथ ही मैन्ग्रोव को बदा दिया गया है क्युकि एक इलाके में नदियों की बाद से ज्वारीय और पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण पानी का स्तरकाफी ऊपर चला गया है पुराने नक़्शे को १/२५००० के पैमाने पर पूरा किया गया है वही नए नक़्शे का पैमाना १/४००० है जिसमे सभी सीमाओ का सीमांकन किया गया है केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राज्य सरकार को लिखा है कि विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति द्वारा २२ सितम्बर के बाद हवाई अड्डे की साईट का दौर किया जाएगा
Tuesday, September 7, 2010
खबर हो खली तो टी आर पी महाबली.......
आज के हिन्दी के खबरिया चैनल खबरों के नाम पर थ्री सी सिनेमा , क्रिकेट ओर सेलेब्रिटी को परोस रहे है.... यही नहीं खबरिया चैनल व्यक्ति की निजी जिन्दगी पर भी खबरे चटपटे अंदाज में दे रहे है....
एक आरुषीकी मौत हो जाती है तो उसकी मौत पर सारा मीडिया बावला हो जाता है.... जबकि आरुषी जैसी कई लड़कियां कोख में जन्म लेने से पहले मार दी जाती है लेकिन हिंदी के खबरिया चैनलों को इससे कोई सरोकार नहीं है.....खबरों को मिर्च मसाले का तड़का देने के चक्कर में भूत प्रेत कंकाल वाली टी वी की हिंदी पत्रकारिता में इजाफा होता जा रहा है .... एक बच्चा अगर कही गिर जाए तो मीडिया उस पर खबरे बनाने में पीछे नहीं रहता लेकिन असलियत ये है सारे मामले मेट्रो के रहते है इसलिए मीडिया इनको तवज्जो देता है जबकि ग्रामीण इलाको में ऐसी घटनाये आये दिन घटती रहती है जिन पर हमारे खबरिया चैनलों की नजर नहीं जा पाती है... आज के खबरिया चैनलों से गाव का किसान गायब हो गया है ... पिछले तीन सालो में लाखो किसानो ने आत्महत्या की लेकिन उनकी खबरे मीडिया से नहीं आ सकी .....आमिर खान की "पीपली लाइव" में एक नत्था फिल्म चलने के बाद सारे मीडिया के सर चढ़ जाता है लेकिन नत्था जैसे कई किसानो पर मीडिया का कोई फोकस नहीं होता है...
इन दिनों हिंदी के मीडिया चैनलों में एक नया चलन चल गया है... कोई रफ़्तार से ५ मिनट में २५ खबरे दिखा रहा है तो कोई फटाफट में ४० खबरे दे रहा है ... हिंदी न्यूज़ चैनलों की माने तो ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि दर्शक खबरों से जुड़े रहे ... वैसे भी आज के समय में खबरिया चैनलों के दर्शक के पास इतना समय नहीं है वह देश दुनिया की खबरे देख सके लिहाजा उनका ये नया कांसेप्ट भी दर्शको को रास नहीं आ रहा है ... खबरे इतनी तेजी से फ्लैश हो जाती है ५ मिनट के बाद दर्शक को ये ध्यान भी नहीं रहता उसने कितनी खबरे देख ली है...
खबरिया हिंदी चैनलों में आजकल किसी मसले पर व्यापक पड़ताल भी नहीं हो रही ...हर किसी से आगे निकलने की होड़ इतनी तेज है आज खबरों की वास्तविकता से रिपोर्टरों का कुछ भी लेना देना नहीं है..... चैनलों में बड़े पदों पर बैठे लोगो को टी आर पी से मतलब होता है ...जिस चैनल की टी आर पी जितना ज्यादा होगी उस चैनल को उतने ज्यादा विज्ञापन मिलेगे.... माना आज के समय में व्यावसायिकता का बोलबाला है लेकिन हिंदी चैनल जनसरोकारो वाली खबरों को अलग नहीं रख सकते.... हिंदी चैनलों को राखी सावंत की चुम्मा बेचने ओर हंसी के रसगुल्ले बेचने से ही फुर्सत नहीं है ...
मीडिया के बहुत से विश्लेषको का मानना है भारतीय खबरिया चैनल अभी शैशव काल में है इसी के चलते आम आदमी के सरोकार टी वी के हिंदी चैनलों से दूर होते जा रहे है.... बेंजामिन ब्रेडली पत्रकारिता जगत का एक बहुत बड़ा नाम है.... शेखर गुप्ता एक बार जब अपने चैनल में उनका साक्षात्कार कर रहे थे तो उन्होंने एक बात बहुत अच्छी कही ... उन्होंने कहा था अमेरिका में आज के समय में अखबार पड़ने वाले दर्शको की संख्या में तेजी से कमी आते जा रही है ....लेकिन उन्होंने कहा अब वहां की टीवी पत्रकारिता बुनियादी मुद्दों की ओर लौट रही है ... अगर इसको आधार बनाये तो हम भारत में खबरिया चैनलों से भी इस बात की उम्मीद कर सकते है कुछ समय बाद भारत के हिंदी के खबरिया चैनलों में भी ये चलन देखने को मिल सकता है ...आखिर जब अपने घर में खाने को नहीं होगा तो कब तक राखी सावंत की चुम्मा , राजू श्रीवास्तव के हंसी के फब्बारे बेचते रहेंगे......
पंक्तिया सटीक है -----
"एक समय आयेगा जब पत्थर भी गाना गायेगा
मेरे बाग़ का फूल फिर से खिल खिलायेगा "
--------------- हर्षवर्धन पाण्डे
Monday, September 6, 2010
पहली बार जम्मू सुरक्षाकर्मियों एक
एकe जम्मू में एकe जायदा नागरिको को मारा.......
केंद्र सरकार जम्मू में जारी हिंसा को कम करने के लिए
Sunday, October 11, 2009
अरुणाचल का दंगल...........
अरुणाचल लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत गद रहा है ...इस बार भी अधिकांश विश्लेषक यहाँ कांग्रेस सरकार को वोक ओवर दे रहे है संभवतया इसका कारन यहाँ का इतिहास रहा है ... आपको यह बताते चले की अरुणाचल में उसी की सरकार बनती है जिसकी केन्द्र में सरकार हो.... इस जुमले पर अगर यकीन करे तो राज्य में कांग्रेस की सरकार बन्ने से कोई नही रोक सकता ...परन्तु इस बार खांडू की राह आसान नही है ... उनकी पार्टी के कई लोगो ने शुरुवात से ही अपने बगावती तेवर अपना लिए है जिसके चलते कई जगह पार्टी की हार की सम्भावना बन रही है ...ममता बनर्जी ने के साथ अपना गठबंधन कर लिया है... और तो और लगभग १५ के आसपास पूर्व मंत्रियो और विधायको को उन्होंने राज्य में tikat दे दिए है जो कांग्रेस की जीत की संभावनाओ पर पलीता लगा रहे है ..खांडू के विरोध में कई लोग sakriy हो गए है ... परिवारवाद की आधी जिस तरीके से कांग्रेस में फल फूल रही है उसको देखते हुए कई लोग कांग्रेस से गुड बाय कह चुके है ... साथ ही राज्य की कांग्रेस में इस समय भयंकर गुटबाजी चल रही है ॥ इन सबके मद्देनजर कांग्रेस अपनी पुरानी सीट बरकरार रख लेगी यह कह पाना मुश्किल दिखाई देता है..इधर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी ममता के साथ मिलकर कांग्रेस को हराने की कोशिशों में जुट गई है ...पी ऐ संगमा ने अपनी चुनावी सभाओ में कांग्रेस की जमकर खिचाई की है ... उनकी बेटी अगाथा संगमा ने भी राज्य में धुआधार प्रचार किया है जिसके परिनाम्म कुछ समय बाद सामने आ सकेंगे.....सबसे ख़राब हालत भाजपा की है ॥ पिछली बार ९ सीट उसने जीती थी ..उसके बाद उसके सारे प्रत्याशी कांग्रेस के पाले में आ गए ....अब खतरे की घंटी उसके लिए उस समय बज गई जब किरण रिजीजू जो पूर्व सांसद है भाजपा से नाता तौड़ लिया .....पिछली बार थोडी बहुत सीट भाजपा को दिलाने में रिजीजू का बड़ा योगदान था.... उनको भावी सी ऍम के रूप में भी देखा जाने लगा था.. अब उनकी भाजपा से विदाई के बाद भाजपा अपनी पुरानी सीट अगर बचा लेगी तो बड़ी गनीमत होगी...... रही बात मुद्दों की तो बुनियादी मुद्दे इस चुनाव में भी साथ है..अभी भी अरुणाचल बुनियादी समस्याओ से वंचित रहा है..इधर मनमोहन ने भी लोगो को आश्वस्त किया है अरुणाचल के पिछडेपन को दूर करने के लिए सरकार एक बड़ा पैकेज देगी ...देखना होगा क्या मनमोहन लोगो का भरोसा जीत पाने में कामयाब हो पाते है या नही ... जो भी हो ममता और राकपा के गठबंधन होने से खाडू के पसीने छूट गए है ?
आईये अब बात महाराष्ट्र की कर लेते है यहाँ भी आज मतदान होना है ॥ एक तरफ़ कांग्रेस राकपा का गठबंधन है तो दूसरी तरफ़ भाजपा शिवसेना का पुराना गठबंधन ... राम दास अठावले के नेतृत्व में बना तीसरा मोर्चा भी अपनी धमाकेदार उपस्थिति इस चुनाव में दर्ज करा रहइस मोर्चे में २३ पार्टिया है ॥ तीसरे मोर्चे के लिए खतरे की घंटी बज गई है क्युकी उससे गवई गुट अलग हो चुका है ... अब देखना होगा देश में तीसरे और चौथे मोर्चे को नकार चुकी जनता क्या इस बार महारास्त्र में उसको कमान सोपती है॥
कांगरी की बात करे तो पर उसको सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है... हालत बहुत अच्छे नही है....अगर लोक सभा के परिणामो पर नजर डाले तो यहाँ दोनों गठबन्धनों में १० सीट का अन्तर रहा था .... कांग्रेस राकपा भाजपा शिवसेना से मात्र १० सीट आगे रही थी॥ अगर इस पर यकीन करे तो यहाँ पर कांग्रेस का पलडा बहुत भारी नही कह सकते.... हाँ यह अलग बात है ९५ में एक बार भाजपा शिवसेना की सरकार यहं जरुर बनी थी पर अभी तक यहाँ कांग्रेस का राज रहा है.... महंगाई , बिजली ,पानी , किसान आत्महत्या ,जैसे मुद्दे कांग्रेस के लिए संकट पैदा कर सकते है ..परिसीमन ने पूरा गणित गडबडा दिया है ...चुनाव में तकरीबन ८९ सीट परिसीमन से प्रभावित हुई है ...राकपा का गद मानी जाने वाली पश्चिमी महाराष्ट्र की करीब ७० सीट परिसीमन से प्रभावित हो गई है अब अगर इस चुनाव में कोई नए नतीजे सामने आ जाए तो कोई चौकने की बात नही होनी चाहिए॥ अल्पसंख्यक वोट भी खासे अहम् है ॥ इस बार यह किसकी और जाते है यह भी महत्वपूर्ण होगा ...खेल ख़राब करने में यह खासे अहम् होंगे॥ अठावले कांग्रेस के कुछ वोट काट सकते है ..अगर दलित और मुस्लिम वोटो में सेंध लगा पाने में वह कामयाब हो गए तो राकपा और कांग्रेस की मुश्किलें तेज हो जायेंगी... चुनावो में कुछ इलाके ऐसे है जो हार जीत को तय करेंगे....पश्चिम महारास्त्र शरद पवार का गद रहा है .... यह इलाका गन्ना उत्पादक किसानो का है॥ इस समय किसान शरद पवार से नाराज चल रहे है जिसका खामियाजा उनको हार के रूप में भुगतना पड़ सकता है ...उत्तरी महारास्त्र में राज ठाकरे मजबूत है... इस बार भी वह यहाँ के समीकरणों को प्रभावित करने की कैपेसिटी रखते है ॥ मराठवाडा में शिव सेना भाजपा गठबंधन मजबूत नजर आ रहा है ॥ यह अलग बात है यह अशोक चौहान का भी नगर है...कोंकण नारायण राने का गद रहा है... इस बार भी यह पर उनका जलवा चल सकता है ..विदर्भ के इलाके में कांग्रेस राकपा को परेशानी उठानी पड़ सकती है ... क्युकी किसानो ने सबसे अधिक आत्महत्या यही की है ...देश में आत्महत्या के मामलो में विदर्भ सबसे आगे है..यहापर शिवसेना भाजपा अच्छा कर सकते है ...
मुंबई की ३६ सीटो पर भी सबकी नजर है ..यहं की ३० सीट उत्तर भारतीय के प्रभाव वाली है ...यहं पर मराठा मानुष का मुद्दा फीका पड़ सकता है...कभी इन सीटो पर शिव सेना का प्रभाव हुआ करता था पर आज परिस्थिति बदल चुकी है ...थाने की २४ सीट भी भावी सरकार की दिशा को तय करेंगी... इन सीट पर भी शिव सेना भाजपा आगे रहा करती थी लेकिन इस लोक सभा चुनाव में वह बुरी तरह से पीछे हो गई थी.....राज ठाकरे की बात करे तो लोक सभा चुनाव में शिव सेना को हारने में उन्होंने खासी भूमिका निभायी ......तकरीबन १० सीट पर वह लोक सभा चुनाव में आगे रही जिसने शिव सेना की सीट कम कराने में अहम भूमिका निभायी...अब इस चुनाव में वह पहली बार मैदान में उतर रही है ...राज की माने तो मराठियों के साथ इस चुनाव में न्याय किया जाएगा....उनके हितों की रखवाली राज ही कर सकते है... इतना तय है राज इस बार भी शिव सेना भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते है ॥ लोक सभा चुनावो में भी देखा गया था उनकी पार्टी तीसरे नम्बर पर रही थी साथ ही दुसरे खेल ख़राब करने में उसने अहम भूमिका निभाई थी इस लिहाज से देखे तो इस बार भी ज़ंग रोमांचक हो रही है.... तीसरा मोर्च अगर अच्छी स्थिति में चले गया तो कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है ... खैर ,जो भी हो महाराष्ट्र की इस बार की ज़ंग रोमांचक बनती जा रही है ...तीसरा मोर्चा और राज की मनसे दोनों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है ॥ ऐसे में देखना होगा महाराष्ट्र के महाभारत में कौन सा योद्धा विजयी होता है ?
Wednesday, February 4, 2009
ऑस्कर की ओर बदते "स्लम डॉग" के कदम .... ........
जहाँ तक फ़िल्म की कहानी की बात है तो इस फ़िल्म का कथानक "विकास स्वरूप " के भारतीय उपन्यास "क्यू एंड ए" पर आधारित है विकास ने २००३ में यह उपन्यास लिखा था जिसका ३५ भाषाओ में अनुवाद हो चुका है इस उपन्यास ने विकास को बहुत चर्चित बना दिया है विकास भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी है जिनकी इस कृति को अफ्रीका में " बोआयाकी " सम्मान से भी नवाजा जा चुका है... अब स्लम डॉग की धूम के बाद उनके इस उपन्यास की बिक्री मार्केट में तेजी से बढ गई है स्लम डॉग सच्चे भारत की तस्वीर को बयां करती है लेकिन भारत के एक बड़े वर्ग को चमचमाते भारत की यह बुलंद तस्वीर रास नही आ रही है इस कारण से यह फ़िल्म विवादों में घिरती जा रही हैकुछ लोगो का मानना है कि इस फ़िल्म में भारत की गरीबी ओर झोपडियो का जीवन मसालेदार अंदाज में फिल्माया है जिस कारण पश्चिम में इसके चाहने वालो की संख्या बढ रही है
वैसे तो यह फ़िल्म विकास के उपन्यास पर आधारित है लेकिन इसकी कहानी उससे हूबहू मेल नही खाती विकास के उपन्यास का नायक जहाँ " राम थॉमस है वही डैनी का नायक "जमाल" है इसी तरह से राम की प्रेमिका उपन्यास में जहाँ नीता है , फ़िल्म में यह "लतिका " है उपन्यास की कहानी कुछ और ही बयां करती है उसमे दिखाया गया है किस प्रकार से धारावी में पला राम नाम का युवक शो शुरू होने के कुछ हफ्ते पहले ही एक अरब की मोटी रकम जीत जाता है लेकिन यहाँ पर एक नई समस्या शो के आयोजकों के सामने आजाती है जब उनके पास राम को देने के लिए रकम नही होती हैअतः वह राम को जालसाज साबित करने में लग जाते है इस दरमियान एक महिला वकील उसकी मदद करने को आगे आती है यह सब फ़िल्म में नही है जो भी हो इस फ़िल्म को देखने के बाद बुलंद भारत की असली तस्वीर देखीजा सकती है आज भी भारत की एक बड़ी आबादी स्लम में रहती है उनका गुजर बसर किस तरह से होता है यह सब हम इस फ़िल्म में देख सकते है गरीबी को लेकर चाहे कुछ भी कहा जा रहा हो लेकिन यह भारत की एक सच्चाई है हम इसको नकार नही सकते आज भी देश की बड़ी आबादी भूख और बेगारी से जूझ रही है उसे दो जून की रोटी भी सही से नसीब नही होती.... इसको पाने के लिए हाड मांस एक करना पड़ता है
फ़िल्म की कहानी "जमाल " और " सलीम" नमक दो युवको के इर्द गिर्द घूमती है स्लम डॉग दोनों की बचपन से जवानी तक के सफर की असली हकीकत को बयां करती हैफ़िल्म में दिखाया गया है एक अदना सा दिखने वाला युवक "जमाल" किस तरह से २ करोड़ जीत जाता हैदोनों के बचपन की दास्ताँ दर्द भरी है बचपन में दंगो की आग में इनकी माँ का कत्ल हो गया जिसके चलते अलग राह पकड़ने को मजबूर होना पड़ा दंगो के बाद दोनों युवक अंडरवर्ल्ड के शिकंजे में फस जाते है जिसमे उनकी सखी लतिका भी शामिलहो जाती है दोनों इसके चंगुल से छूट जाते है लेकिन लतिका वही की वही फस जाती है देश में बच्चो के अपहरण करने वालो का गिरोह किस कदर सक्रिय है यह फ़िल्म में दिखाया गया है वह बच्चो से अपने मुताबिक काम कराने से कोई गुरेज नही करता वहां से भागने के बाद जमाल की राह तो अलग हो जाती है लेकिन सलीम फिर से गिरोह वालो के चंगुल में फस जाता है जहाँ पर लतिका भी उसके साथ है बाद में जमाल केबीसी के शो में भाग लेता है जहाँ पर सभी सवालों के जवाब देकर वह "मिलेनियर " बन जाता है लेकिन लोग इस बात को नही पचा पाते की कैसे स्लम से आने वाला एक युवक सही जवाब दे देता है ? लेकिन "जमाल" अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर सवालो के जवाब दे देता है अन्तिम सवाल पूछने से पहले पुलिस उसको प्रताडित करने से बाज नही आती लेकिन जमाल का आत्मविश्वास देखते ही बनता है उसकी माने तो "मुझे जवाब आता है" पुलिस उसको पकड़कर इस पहेली का हल खोजने की कोशिस करती है लेकिन उसको सफलता नही मिल पाती "जमाल" के भाग्य में करोड़पति बनना लिखा होता है वह बनकर रहता है
जहाँ फ़िल्म में छोटे जमाल की भूमिका में आयुस उतरे है वही देव पटेल ने बड़े जमाल की भूमिका निभाई है छोटे जमाल के द्वारा किया गया एक शोट ध्यान खीचता है जिसमे जमाल अपने प्रिय अभिनेता " बिग बी " के दर्शनों को पाने के लिए इस कदर बेताब रहता है की वह "गटर" में छलांग लगाकर भीड़ में अपने अंकल के ऑटो ग्राप के लिए हेलीकाप्टर के पास दोड़ता है इरफान खान, अनिल कपूर, फ्रीदा पिंटो का अभिनय भी फ़िल्म में लाजावाब है गुलजार के गाने झूमने को मजबूर कर देते है साथ ही अपने "रहमान " का तो क्या कहना .... जय हो जय हो .... हाथी घोड़ा पालकी जय बोलो रहमान की .....रहमान के संगीत की प्रशंसा में शब्द नही है .... इस बार ऑस्कर पाने की उनसे आशाए है सभी को ... अब २२ फरवरी का इंतजार है .... दिल थामकर बैठिये... सब्र का फल मीठा होता है .....अगर उनको यह मिल जात है तो वह पहले भारतीय होंगे जिसने किसी विदेशी की फ़िल्म में काम कर इसको पाया १० नामांकनों पर सबकी नजरें लगी है भारत में जो लोग स्लम डॉग की आलोचना कर रहे है उनको यह सोचना चाहिए सच्चाई से आप अपने को अलग नही कर सकते ... असली हिंदुस्तान फुटपाथ पर आबाद है सबसे दुःख की बात तो यह है स्लम डॉग भारत का उपन्यास है और इस पर फ़िल्म विदेशी बना रहा है एक सवाल जो हमको बार बार कचोट रहा है वह यह है हमारे " होलीवूड " वाले कब तक "प्यार के फंडो" पर बन रही फिल्मो से इतर सोचना शुरू करेंगे ? इस लीक से हटकर सोचने का माद्दा हमारे यहाँ ले देकर एक व्यक्ति ने निभाया है उसका नाम सत्यजीत ... सत्यजीत ने इस नब्ज को अपनी फिल्मो में सही से पकड़ा लेकिन इसके चलते उनको भी आलोचना का शिकार होना पड़ा था नरगिस के द्वारा पहले भी सत्य जीत राय की फिल्मो की आलोचना की जाती रही है उनका मानना था भारत की गरीबी को सत्य जीत विदेशों में बेच कर आते .... खैर जो भी हो हाल के कुछ वर्षो में भारत का नाम ऊँचा हुआ है॥ अपने "अरविन्द ओडीगा " व्हाइट टायगर " पर पुरस्कार जीतकर भारत का झंडा बुलंद कर चुके ... अब बारी विकास के उपन्यास की है .... क्या हुआ ऑस्कर अगर स्लम डॉग को ही मिले उसकी कहानी तो स्वरूप की ही .......
Monday, January 26, 2009
अगाध आस्था और विश्वास का केन्द्र ऋषे श्वर महादेव ......
उत्तराखंड के पग पग पर देवालयों की कतारे है इसी कारण यहाँ की धरा को देवभूमि की संज्ञा से नवाजा गया है अपने बहुत से धार्मिक कार्यो के द्वारा यहाँ की भूमि को अनेक ऋषियों ने धन्य कियाहै कई साधू महात्माओ ने तो आजीवन यहाँ जनम पाने की आकांशा लिए समाधी तक ली है प्राचीन समय से ही यहाँ के पौराणिक धर्म स्थलों के प्रति आम जनमानस की गहरी रूचि रही है आज भी यहाँ के देवालयों में आने वाला हर एक भक्त एक अमित छाप लेकर जाता है और बार बार यहाँ आने की कामना करता है निराश प्राणी यहाँ आकर सुख शान्ति की अनुभूति करता है एक तरह से यहाँ की वादियों में डेरा जमाकर व्यक्ति परम पिता प्रभु के दर्शनों की आस में अपना तन मन समर्पित कर देता है उसके मन में किसी भी तरह से अनंत ब्रहम के दर्शनों की जिज्ञासा जाग उठती है
उत्तराखंड का सीमान्त जनपद चम्पावत अपने प्राकृतिक सौन्दर्य और रमणीयता के लिए प्रसिद्ध रहा है यहाँ पर मौजूद बहुत सारे पौराणिक स्थल इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगाते है यहाँ पर जहाँ पूर्णागिरी माता का चमत्कारिक मन्दिर है, वहीँ री टा साहब जैसे सर्व धर्म समभाव वाले स्थल भी है चम्पावत जनपद में बालेश्वर , नागनाथ जैसे मन्दिर भी है जो इसका महत्त्व बताते है ,विश्व प्रसिद्ध "बग्वाल" मेला भी यहीं होता है जिसमे पत्थर युद्ध होता है माता बाराही का मन्दिर विश्व में अपनी ख्याति पाए हुए है
चम्पावत से तकरीबन १२ किलो मीटर की दूरी पर लोहाघाट नगर स्थित है चम्पावत से लोहाघाट आने पर ऋषे श्वर महादेव का अनुपम देवालय पर्यटकों का मन मोह लेता है देव शिव शंकर की यह तपस्थली चारो दिशाओ से देवदार के सघन वनों से भरी पड़ी है ऐसा माना जाता है की यहाँ पर सप्त ऋषियों ने सतयुग में तपस्या कर भोलेशंकर भगवान् को प्रसन्न किया था तब शिव शंकर यहाँ प्रकट हुए थे , तभी से लोगो में इसके प्रति आस्था बनीं हुई है जन शुत्रियो के अनुसार यह भी माना जाता है , यहाँ पर शिव शंकर भगवान् अपने अपने भक्त बाणासुर की रक्षा करने को प्रकट हुए थे और यहीं पर उन्होंने बाणासुर को अपराजेय होने का वर दिया था जो आगे चलकर उसके लिए कई बार लाभकारी साबित हुआ शिव से अजेय वर पाकर बाणासुर अपने को अपराजेय समझने लगा था
किन्दवंतिया है की इस वर को पाने के बाद बाणासुर युद्ध के मोर्चे पर हर किसी दो दो हाथ करने की ठानता है ,लेकिन कोई वीर सूरमा उसके कद के लिए नही मिल ता है और वह उसे वर दान देकर अपराजेय बनने वाले शिव शंकर भगवान से ही युद्ध करने की ठान लेता है शिव बाणासुर के घमंड को देखकर उससे रणभूमि में युद्ध करने को तैयार होते है परन्तु पार्वती उनको ऐसा करने से रोक लेती है अपनी पत्नी के आदेश पर अब शिव बाणासुर से कहते है जिस दिन महल के ऊपर की धवजा धरती पर गिरेगी उसी दिन तुमसे दो दो हाथ करने को कोई तैयार होगा ऐसा माना जाता है आगे चलकर उस के गिरने पर कृष्ण के साथ शिव का युद्ध हो जाता है तब बाणासुर की रक्षा करने को शिव आते है युद्ध इतना भयानक होता है की खून की धाराए बहने लगती है खून की धाराएं नदी का रूप धारण कर लेती है इसी नदी को"लोहावती" नदी कहा जाता है जो मन्दिर के पास से बहती है बाद में शिव के आग्रह पर कृष्ण बाणासुर को छोड़ देते है और स्वयं कैलाश में चले जाते है लोगो का मानना है की शंकर यहाँ आने से पहले अपने कुछ बेताल और भेरव को यहाँ छोड़ जाते है जो यहाँ शिव लिंग अपने आराध्य देव के लिए स्थापित कर जाते है , जिसकी आगे चलकर पूजा की जाती है वर्त्तमान में इसी लिंग ने ताबे में स्थान ग्रहण कर लिया है फिर भी इस शिव लिंग की स्थापना कैसे हुई इस विषय में लोगो में एका नही है?
मन्दिर बहुत से चमत्कारों से भरा है स्थानीय पुजारी कहते है पुराने समय में अंग्रेजो के काल में भी मन्दिर कई चमक्तारो का साक्षी रहा है बताते है एक बार एक अंग्रेज ने मन्दिर में गर्दन बना दिया और गेट पर ताला दाल दिया उस समय देवता अवतरित हुए थे यह शक्ति "डंगरिया" पर आई थी ताला लगने के बाद जब वह डंगरिया देव के रूप में मन्दिर में आया तो उसने "चावल के " दाने फैककर ताले को अलग कर दिया सच में वह अद्भुत चमत्कार था इस सकती को देखकर अंग्रेज भी महादेव के आगे नतमस्तक हो गएऔर ताबे का कलश मन्दिर में चदाया तभी से यहाँ पर विशाल शिव लिंग विराजमान है कुछ लोगो का मानना है की पास में शव विसर्जन के लिए घाट होने के कारण किसी दिव्य "भूत पिसाच का भी वास है परन्तु यह सभी शिव के गन के रूप में जाने जाते है
ने मन्दिर के पास बकरी की बलि पुजारी के आदेश की अवहेलनाकर ली पुजारी के लाख विनय करने के बाद उसने किसी की एक नही सुनी तभी शिव शंकर उससे गुस्सा हो गएऔर की शुरूवात घनघोर बारिस से हुईजिसने पास में चल रहे निर्माण कार्यो को भारी हानि पहुचायीऔर सवयम वह मुस्लिम युवक अपना मानसिक संतुलन खो बैठा कहा जाता है आगे चलकर शिव ने उसको माफ्ह किया और उस युवक ने अपने जीवन के शेष बसंत शिव अर्चन में अर्पित कर दिए तभी से मन्दिर के प्रति लोगो में गहरी आस्था उभरनी शुरू हुई लोहाघाट में इस मन्दिर को सभी मनो रथो को पूरा करने वाला जाना जाता है यहाँ की पूजा के द्वारा मनुष्य के सारे कार्य पूरे हो जाते है
मन्दिर को विकशित करने में श्री श्री १०८ स्वामीजी हीरानंद जी महाराज का बहुत योगदान है वह पिचले ३४ वर्षो से यहाँ पर साधना में तल्लीन है समय समय पर यहाँ पर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता रहा हैनवरात्रियों में भी यहाँ पर भक्तो की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है उत्तराखंड में पौराणिक स्थानों की भारी भरमार मौजूद है वर्त्तमान खंडूरी सरकार के कार्यकाल में तीर्थाटन और धर्मस्व मंतरालय भी बनाया गया है ,परन्तु सरकार की भारी उपेक्सके चलते आज ऐसे धार्मिक स्थल उपेक्षित पड़े हैसरकार को आज जरूरत है की ऋषि स्वर सरीखे धार्मिक स्थलों को लेकर कोई नीति बनाये कोलिधेक निवासी "चंचल सिंह ढेक" कहते है "
इस मन्दिर की चमत्कारिक देखते ही बनती हैयहाँ पर आने वल्का हर पर्यटक एक अमित याद को लेकर जाता है सरकार को चाहिए वह ऐसे स्थलों अपनी प्राथामिकताओ में शामिल करे जिससे इस स्थान की कीर्ती दूर दूर तक फेल सकती है ............
Thursday, October 9, 2008
bagal me jo bhi hoga .. likha jaayega
जनपद मुख्यालय से सटे छावनी एरिया और कुसोली गाव के मध्य में स्थित माता जी का यह दरबार पिथोरागढ़ में खासी प्रसिद्धी पाये हुए है ...माता के इस दरबार तक पहुचने में भक्तो को खासी परेशानियों का सामना नही करना पड़ता है ....जनपद मुख्यालय से सटे कुछ किलो मीटर की दूरी पर स्थित केंट एरिया हेतु हर समय वाहनों की सेवा रहती है... वाहन से कुछ दूरी उतरकर यहाँ से थोडी चदायी चदकर भक्त आस्था के इस पवन केन्द्र तक पहुच सकते है , जहाँ माता के दर्शनों से आत्मिक सुख शान्ति मिलती है ....
स्थानीय लोग बताते है इस मन्दिर की स्थापना वर्ष १९७२ में मदन मोहन शर्मा के प्रयासों से हुई ...... तब मन्दिर का स्वरूप बहुत छोटा था... किंतु स्थानीय धर्म प्रेमी जनता के प्रयासों से अभी कुछ वर्षो में मन्दिर ने काफी विशाल स्वरूप को ग्रहण कर लिया है... मन्दिर के विस्तारीकरण में वास्तुकार डी शाह ने महत्वपूरण योगदान दिया है ... वह उत्तराखंड के प्रसिद्ध वास्तुकार रहे है...
मन्दिर का प्रवेश द्वार बंगला शेली में बनाया गया है... जो बहुत खूबसूरत दिखाई देता है... यहाँ के मन्दिर की वास्तुकला यहाँ आने वाले हर भक्क्त का मन मोह लेती है... मन्दिर में माता की विशाल प्रतिमा लगायी गई है ...जिसके दर्शन भक्त दूर से कर सकते है... मन्दिर की दीवारों में की गई नक्कासी , संस्कृत में लिखे गए श्लोक , आरतिया हर भक्त के मन को खुश कर देती है... मन्दिर में भेरव देवता , बजरंग बली जी की मूर्तिया भी स्थापित की गई है...मन्दिर में भजन कीर्तन के पर्याप्त स्थान के अलावा यज्ञशाला का निर्माण भी किया गया है.... यज्ञशाला के उपर प्राकृतिक रोशनी को शीशे लगवाये गए है ...मन्दिर परिसर से हवाई पट्टी के दृश्य देखकर काफी सुकून मिलता है... साथ ही यहाँ जाकर आपको नैनी सेनी गाव का विहंगम दृस्य भी देखने को मिलता है...यहाँ पर आकर मन को शान्ति मिलती है... मंद मंद बहने वाली हवा जब चलती है तो ऐसा लगता हैयही बस जाया जाए....भक्तो में माता के प्रति अगाध आस्था और विश्वास बना है.... इसका कारन यह हैमाता के दरबार की शीतलता मन को तृप्त कर देती है ... छावनी एरिया से लगे होने के कारन सेना के जवानों में माता के दर्शनों की भारी होड लगी रहती है..... जवान माता को एक अराध्य देवी के रूप में मानते है इस कारन से दूर दूर से आर्मी के जवान यहाँ आकर मन्नते मांगते है ... वैसे भी मन्दिर निर्माण में ६९ ब्रिगेड का खासा योगदान रहा है.... मन्दिर के रख रखाव में भी सेना के कुमाऊ रेजिमेंट के जवानों का खासा योगदान है...
कुछ वर्षो पहले तक यहाँ पर सावन मास , नवरातो , धार्मिक आयोजनों में ही भीड़ लगी रहती थीलेकिन हाल के कुछ समय से भक्तो की आवाजाही यहाँ दिन रात लगी रहती है...मन्दिर के प्रवेश द्वार से नीचे एक छोटा सा मन्दिर है...जहाँ पर विशाल शिव लिंग का निर्माण किया गया है... यदि राज्य सरकार मन्दिर के सौन्दर्यीकरण , विस्तारीकरण की दिशा में धयान दे तो यह स्थल अध्यात्मिक केन्द्र के रूप में पर्यटन मानचित्र में अपनी जगह बनने में सफल हो सकता है....लोगो को उत्तरखंड के पर्यटन मंत्री "प्रकाश पन्त " से इस दिशा में कई उम्मीद है लेकिन अभी तक सरकार ने इस दिशा में कोई कारगर पहल नही की है जिस कारन लोगो में निरासा है...
कुछ समय पहले जब मेरा उत्तराखंड जाना हुआ तो यहाँ कुछ दिनों तक रुकना हुआ.... इस दौरान मन्दिर में कई भक्तो से भी मुलाकात हुई....मन्दिर बाबत पूछने पर पिथोरागढ़ सुवाकोट के रहने वाले युवा "राजेंद्र "( गुड्डू) ने बताया की राज्य सरकार को पर्यटन के लिहाज से कारगर पहल करने की जरूरत है जिससे देव भूमि के कई सुंदर मंदिरों की गूंज दूर दूर तक फेलेगी......