Friday, September 30, 2011

आतंरिक सुरक्षा के लिये खतरा बनता नक्सलवाद................

" हमारे बाप दादा ने जिस समय हमारा घर बनाया था उस समय घर पर सब कुछ ठीक ठाक था ... संयुक्त परिवार की परंपरा थी ... सांझ ढलने के बाद सभी लोग एक छत के नीचे बैठते थे ओर सुबह होते ही अपने खेत खलिहान की तरफ निकल पड़ते थे ॥ अलिकिन अब हमारे पास रोजी रोटी करता साधन नहीं है... जल ,जमीन,जंगल हमसे छीने जा रहे है और दो जून की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल होता जा रहा है ... हमारी वन सम्पदा कारपोरेटघराने लूट रहे है और "मनमोहनी इकोनोमिक्स " के इस दौर में अमीरों और गरीबो की खाई दिन पर दिन चौड़ी होती जा रही है "

६८ साल के रामकिशन नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के बस्तर सरीखे अति संवेदनशील इलाके से आते है जिनकी कई एकड़ जमीने उदारीकरण के दौर के आने के बाद कारपोरेटी बिसात के चलते हाथ से चली गई ... पिछले दिनों रामकिशन ने ट्रेन में जब अपनी आप बीती सुनाईतो मुझे भारत के विकास की असली परिभाषा मालूम हुई.... "शाईनिंग इंडिया" के नाम पर विश्व विकास मंच पर भारत की बुलंद आर्थिक विकास डॉ करता हवाला देने वाले हमारे देश के नेताओ को शायद उस तबके की हालत करता अंदेशा नहीं है जिसकी हजारो एकड़ जमीने इस देश में कॉरपोरेट घरानों के द्वारा या तो छिनी गई है या यह सभी छीनने की तैयारी में है...

दरअसल इस दौर में विकास एक खास तबके के लोगो के पाले में गया है वही दूसरा तबका दिन पर दिन गरीब होता जा रहा है जिसके विस्थापन की दिशा में कार्यवाही तो दूर सरकारे चिंतन तक नहीं कर पाई है ..... फिर अगर नक्सलवाद सरीखी पेट की लड़ाई को सर्कार अलग चश्मे से देखती है तो समझना यह भी जरुरी होगा की उदारीकरण के आने के बाद किस तरह नक्सल प्रभावित इलाको पर सर्कार ने अपनी उदासीनता दिखाई है.... जिसके चलते लोग उस बन्दूक के जरिये "सत्ता " को चुनोती दे रहे है जिसके सरोकार इस दौर में आम आदमी के बजाय " कोर्पोरेट " का हित साध रहे है.........

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलवादी लड़ाई को अगर देश की आतंरिक सुरक्षा के लिये एक बड़ा खतरा बताते है तो समझना यह भी जरुरी हो जाता है आखिर कौन से ऐसे कारण है जिसके चलते बन्दूक सत्ता बकी नाली के जरिये "चेक एंड बेलेंस" करता खेल खेलना चाहती है?

काल मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत के रूप में नक्सलवाद की व्यवस्था पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से १९६७ में कानू सान्याल, चारू मजूमदार, जंगल संथाल की अगुवाई में शुरू हुई .... सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक समानता स्थापित करने के उद्देश्य से इस तिकड़ी ने उस दौर में बेरोजगार युवको , किसानो को साथ लेकर गाव के भू स्वामियों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था ......उस दौर में " आमारबाडी, तुम्हारबाडी, नक्सलबाडी" के नारों ने भू स्वामियों की चूले हिला दी.... इसके बाद चीन में कम्युनिस्ट राजनीती के प्रभाव से इस आन्दोलन को व्यापक बल भी मिला ..........

केन्द्रीय गढ़ मंत्रालय की रिपोर्ट को अगर आधार बनाये तो इस समय आन्ध्र, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, बिहार , महाराष्ट्र समेत १४ राज्य नक्सली हिंसा से बुरी तरह प्रभावित है..... नक्सलवाद के उदय करता कारण सामाजिक, आर्थिक , राजनीतिक असमानता ओर शोषण है.... बेरोजगारी, असंतुलित विकास ये कारण ऐसे है जो नक्सली हिंसा को लगातार बड़ा रहे है......नक्सलवादी राज्य करता अंग होने के बाद भी राज्य से संघर्ष कर रहे है चूँकि इस समूचे दौर में उसके सरोकार एक तरह से हाशिये पर चले गए है .....और सत्ता ओर कॉर्पोरेट का कॉकटेल जल , जमीन, जंगल, के लिये खतरा बन गया है..... इनका दूरगामी लक्ष्य सत्ता में आमूल चूल परिवर्तन लाना है ......इसी कारण सत्ता की कुर्सी सँभालने वाले नेताओ और नौकरशाहों को ये सत्ता के दलाल के रूप में चिन्हित करते है ......

नक्सलवाद के बड़े पैमाने के रूप में फैलने का एक कारण भूमि सुधार कानूनों का सही ढंग से लागू ना हो पाना भी है....जिस कारण अपने प्रभाव के इस्तेमाल के माध्यम से कई ऊँची रसूख वाले जमीदारो ने गरीबो की जमीन पर कब्ज़ा कर दिया जिसके एवज में उनमे काम करने वाले मजदूरों का न्यूनतम मजदूरी देकर शोषण शुरू हुआ ॥ इसी का फायदा नक्सलियों ने उठाया ओर मासूमो को रोजगार और मासूमो को रोजगार और न्याय दिलाने करता झांसा देकर अपने संगठन में शामिल कर दिया... यही से नक्सलवाद की असल में शुरुवात हो गई ओर आज कमोवेश हर अशांत इलाके में नक्सलियों के बड़े संगठन बन गए है ..... आज आलम ये है की हमारा पुलिसिया तंत्र इनके आगे बेबस हो गया है इसी के चलते कई राज्यों में नक्सली सामानांतर सरकारे चला रहे है .....


देश की सबसे बड़ी नक्सली कार्यवाही १३ नवम्बर २००५ को घटी जहाँ जहानाबाद जिले में मओवादियो ने किले की तर्ज पर घेराबंदी कर स्थानीय प्रशाशन को अपने कब्जे में ले लिया जिसमे तकरीबन ३०० से ज्यादा कैदी शामिल थे .."ओपरेशन जेल ब्रेक" नाम की इस घटना ने केंद्र और राज्य सरकारों के सामने मुश्किलें बढ़ा दी...तब से लगातार नक्सली एक के बाद एक घटनाये कर राज्य सरकारों की नाक में दम किये है॥ चाहे मामला बस्तर का हो या दंतेवाडा का हर जगह एक जैसे हालात है....आज तकरीबन देश के एक चौथाई जिले नक्सलियों के कब्जे में है.... वर्तमान में नक्सलवादी विचारधारा हिंसक रूप धारण कर चुकी है .... सर्वहारा शासन प्रणाली की स्थापना हेतु ये हिंसक साधनों के जरिये सत्ता परिवर्तन के जरिये अपने लक्ष्य प्राप्ति की चाह लिये है ....

सरकारों की "सेज" सरीखी नीतियों ने भी आग में घी डालने का काम किया है....सेज की आड़ में सभी कोर्पोरेट घराने अपने उद्योगों की स्थापना के लिये जहाँ जमीनों की मांग कर रहे है वही सरकारों करता नजरिया निवेश को बढ़ाना है जिसके चलते औद्योगिक नीति को बढावा दिया जा रहा है .."कृषि " योग्य भूमि जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीड है उसे ओद्योगिक कम्पनियों को विकास के नाम पर उपहारस्वरूप दिया जा रहा है.... जिससे किसानो की माली हालत इस दौर में सबसे ख़राब हो चली है.... यहाँ बड़ा सवाल ये भी है "सेज" को देश के बंजर इलाको में भी स्थापित किया जा सकता है लेकिन कंपनियों पर " मनमोहनी इकोनोमिक्स " ज्यादा दरियादिली दिखाता नजर आता है....जहाँ तक किसानो के विस्थापन का सवाल है तो उसे बेदखल की हुई जमीन करता विकल्प नहीं मिल पा रहा है ॥ मुआवजे का आलम यह है सत्ता में बैठे हमारे नेताओ का कोई करीबी रिश्तेदार अथवा उसी बिरादरी का कोई कृषक यदि मुआवजे की मांग करता है तो उसको अधिक धन प्रदान किया जा रहा है .... मंत्री महोदय का यही फरमान ओर फ़ॉर्मूला किसानो के बीच की खायी को और चौड़ा कर रहा है .... सरकार से हारे हुए मासूमो की जमीनों की बेदखली के बाद एक फूटी कौड़ी भी नहीं बचती जिस कारन समाज में बदती असमानता उन्हें नक्सलवाद के गर्त में धकेल रही है ..."सलवा जुडूम" में आदिवासियों को हथियार देकर अपनी बिरादरी के "नक्सलियों" के खिलाफ लड़ाया जा रहा है जिस पर सुप्रीम कोर्ट तक सवाल उठा चुका है...

हाल के वर्षो में नक्सलियों ने जगह जगह अपनी पैठ बना ली है और आज हालात ये है की बारूदी सुरंग बिछाने से लेकर ट्रेन की पटरियों को निशाना बनाने में ये नक्सली पीछे नहीं है... अब तो ऐसी भी खबरे है नक्सलियों की पाक की ख़ुफ़िया एजेंसी आई एस आई से भी संपर्क होना कोई नयी बात नहीं है... हिंसा और आराजकता करता माहौल बनाने में जहाँ चीन इनको हथियारों की सप्लाई कर रहा है वही हमारे देश के कुछ सफेदपोश नेता धन देकर इनको हिंसक गतिविधियों के लिये उकसा रहे है....अगर ये बात सच है तो यकीन जान लीजिये यह सब हमारी आतंरिक सुरक्षा के लिये खतरे की घंटी है.... केंद्र सरकार के पास इससे लड़ने के लिये इच्छा शक्ति का अभाव है वही राज्य सरकारे केंद्र सरकार के जिम्मे इसे डालकर अपना उल्लू सीधा करती है... असलियत ये है कानून व्यवस्था शुरू से राज्यों का विषय रही है ....हमारा पुलिसिया तंत्र भी नक्सलियों के आगे बेबस नजर आता है.... राज्य सरकारों में तालमेल में कमी का सीधा फायदा ये नक्सली उठा रहे है.... पुलिस थानों में हमला बोलकर हथियार लूट कर वह जंगलो के माध्यम से एक राज्य की सीमा लांघ कर दुसरे राज्य में चले जा रहे है ...ऐसे में राज्य सरकारे एक दुसरे पर दोषारोपण कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर लेती है... इसी आरोप प्रत्यारोप की उधेड़बुन में हम आज तक नक्सली हिंसा समाधान नहीं कर पाए है... गिरः मंत्रालय की " स्पेशल टास्क फ़ोर्स " रामभरोसे है ॥ इसे अमली जामा पहनाने में कितना समय लगेगा कुछ कहा नहीं जा सकता.....? केंद्र के द्वारा दी जाने वाली मदद का सही इस्लेमाल कर पाने में भी अभी तक पुलिसिया तंत्र असफल साबित हुआ है ....भ्रष्टाचार रुपी भस्मासुर करता घुन ऊपर से लेकर नीचे तक लगे रहने के चलते आज तक कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ पाए है...साथ ही नक्सल प्रभावित राज्यों में आबादी के अनुरूप पुलिस कर्मियों की तैनाती नहीं हो पा रही है....कॉन्स्टेबल से लेकर अफसरों के कई पद जहाँ खली पड़े है वही ऐसे नक्सल प्रभावित संवेदनशील इलाको में कोई चाहकर भी काम नहीं करना चाहता.... इसके बाद भी सरकारों का गाँव गाँव थाना खोलने का फैसला समझ से परे लगता है....

नक्सल प्रभावित राज्यों पर केंद्र को सही ढंग से समाधान करने की दिशा में गंभीरता से विचार करने की जरुरत है.... चूँकि इन इलाको में रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी समस्याओ का अभाव है जिस कारन बेरोजगारी के अभाव में इन इलाको में भुखमरी की एक बड़ी समस्या बनी हुई है.... सरकारों की असंतुलित विकास की नीतियों ने इन इलाके के लोगो को हिंसक साधन पकड़ने के लिये मजबूर कर दिया है ... इस दिशा में सरकारों को अभी से विचार करना होगा तभी बात बनेगी.... आन्यथा आने वाले वर्षो में ये नक्सलवाद "सुरसा के मुख" की तरह अन्य राज्यों को निगल सकता है....

कुल मिलकर आज की बदलती परिस्थितियों में नक्सलवाद भयावह रूप लेता नजर आ रहा है... बुद्ध, गाँधी की धरती के लोग आज अहिंसा का मार्ग छोड़कर हिंसा पर उतारू हो गए है... विदेशी वस्तुओ करता बहिष्कार करने वाले आज पूर्णतः विदेशी विचारधारा को अपना आदर्श बनाने लगे है... नक्सल प्रभावित राज्यों में पुलिस कर्मियों की हत्या , हथियार लूटने की घटना बताती है नक्सली अब "लक्ष्मण रेखा" लांघ चुके है....नक्सल प्रभावित राज्यों में जनसँख्या के अनुपात में पुलिस कर्मियों की संख्या कम है... पुलिस जहाँ संसाधनों का रोना रोटी है ....वही हमारे नेताओ में इससे लड़ने के लिये इच्छा शक्ति नहीं है ....ख़ुफ़िया विभाग की नाकामी भी इसके पाँव पसारने करता एक बड़ा कारन है ....एक हालिया प्रकाशित रिपोर्ट को अगर आधार बनाये तो इन नक्सलियों को जंगलो में "माईन्स" से करोडो की आमदनी होती है.... कई परियोजनाए इनके दखल के चलते लंबित पड़ी हुई है....

नक्सलियों के वर्चस्व को जानने समझने करता सबसे बेहतर उदाहरण झारखण्ड का "चतरा " और छत्तीसगढ़ करता "बस्तर" ओर "दंतेवाडा " जिला है जहाँ बिना केंद्रीय पुलिस कर्मियों की मदद के बिना किसी का पत्ता तक नहीं हिलता.... यह काफी चिंताजनक है नक्सल प्रभावित राज्यों में आम आदमी अपनी शिकायत दर्ज नहीं करवाना चाहता ॥ वह पुलिसिया तंत्र में भ्रष्टाचार पसरगया है .... साथ ही पुलिस का एक आम आदमी के साथ कैसा व्यवहार है यह बताने की जरुरत नहीं है....

अतः सरकारों को चाहिए वह नक्सली इलाको में जाकर वह बुनियादी समस्याए दुरुस्त करे क्युकी आरती विषमता के चले ही वह लोग आज बन्दूक उठाने को मजबूर हुए है... ऊपर की कहानी केवल रामकिशन की नहीं , कहानी घर घर के रामकिशन की बन चुकी है........




Monday, September 26, 2011

तुम मुझे य़ू भुला ना पाओगे.........

"तेरा जाना दिल के अरमानो का लुट जाना" .....विदर्भ की जनता पर आज हिंदी फिल्म का यह पुराना गाना सौ फीसदी सच साबित हो रहा है.... अपने किसी जन नेता के खोने का गम किसी को कैसा सताता है यह इस गाने से बखूबी साबित हो जाता है... बीते दिनों कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बाबू साहब उर्फ बसंत राव साठे की मौत की खबर से पूरे विदर्भ वासी शोकमग्न है... साठे का गुडगाव में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया .... ८६ वर्षीय साठे इंदिरा , राजीव, नरसिंह राव की तीनो सरकार में वरिष्ठ मंत्री और अन्य पदों पर रहे थे ......उनके निधन से महाराष्ट्र के विदर्भ ने एक बड़े जन नेता को खो दिया .......... साठे से जुडी कुछ यादें......... एक श्रधांजलि........


मभाव का पालन करते हुए वे अंतिम समय तक गाँधीवादी नेता बने रहे ...कांग्रेस में उनकी गिनती शुरुवात से नेहरु गाँधी परिवार के प्रति बनी रही......

विदर्भ के कट्टर समर्थक ---- सार्वजनिक जीवन में रहते हुए २००३ में साठे ने अपने सहयोगी एन के पी साल्वे के संघ कांग्रेस का त्याग किया था ... यह कदम उन्होंने स्वतन्त्र विदर्भ की मांग के समर्थन में उठाया था .....

मिलिटरी स्कूल में शिक्षा --- साठे ने अपनी आरंभिक पदाई नासिक के भोंसले मिलिटरी स्कूल से की .... नागपुर विश्व विद्यालय से उन्होंने अर्थशास्त्र , राझ्नीतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली ... साथ ही उन्होंने अपनी वकालत भी की......

बाक्सिंग चैम्पियन---- विचारो से गाँधीवादी , आत्मा से समाजवादी पड़ी के दरमियान खेलो में भी आगे रहे.... मौरिस स्कूल से वह बाक्सिंग चैम्पियन भी रहे....

समाजवादी से कांग्रेसी ---- साठे मशहूर वक्ता होने के साथ ही सामाजिक जीवन से समाजवादी नजर आये... १९४८ में उन्होंने लोहियावाद से प्रेरित होकर समाजवादी पार्टी में प्रवेश लिया ... १९६४ में अशोक मेहता से प्रेरित होकर उन्होंने कांग्रेस पार्टी में राजनीती को करियर के रूप में चुना......

अकोला से सांसद -----साठे ने अपना पहला लोक सभा चुनाव १९७२ में अकोला से लड़ा था .... १९७० में वह य़ू एन ओ में भारतीय प्रतिनिधित्व भी कर चुके थे.....

इंदिरा के साथी---- आपातकाल और उसके बाद विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने इंदिरा गाँधी का साथ दिया.... १९७७ में इसके फलस्वरूप उनको कांग्रेस संसदीय दल का उपनेता बनने का मौका मिला...... १९७९ तक वह पार्टी के प्रवक्ता भी रहे......

कलर टी वी योगदान --- १९८० में साठे कांग्रेस सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बनाये गए.....इस दौर में उन्होंने भारत में टी वी के युग की शुरुवात की.....हम लोग, बुनियाद जैसे सेरियालो की नीव डालने और १९८३ के एशियन गेम को टी वी में दिखाकर उन्होंने सबसे सामने खुद का लोहा मनवाया था.....

८० में वर्धा से निर्वाचित---- १९७२ में अकोला संसदीय इलाके से चुनाव जीतने के बाद साठे १९८० में महात्मा गाँधी की कर्म स्थली वर्धा से चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री बने ....... ७२ में योजना आयोग के सलाहकार नियुक्त हुए .... ८० से ९० तक लगतार वर्धा का प्रतिनिधित्व भी किया... इस दरमियान वह इस्पात, रसायन, उर्वरक कोयला मंत्री भी रहे ....... विदर्भ में उद्योग को गति भी सही मायनों में साठे ने ही दी......

लेखक भी रहे--- बसंतराव लेखन से भी जुड़े रहे.... २००५ में अपना ८१ वा जन्म दिन मनाते समय उन्होंने अपनी आत्मकथा " मेमोरीज ऑफ़ ऐ रेशेंलिस्ट " लिखी...उन्होंने नए भारत नयी चुनौतिया , भारत में आर्थिक लोकतंत्र समेत तकरीबन आठ किताबे लिखी......इन आठो किताबो में उनकी काले धन पर लिखी गई एक किताब खासी महत्वपूर्ण है....

उतारा था यूनियन जेक----- बसंतराव में बचपन से देश प्रेम की भावना कूट कूट कर भरी हुई थी.... १९४२ में नागपुर की जिला अदालत की ईमारत पर चदकर उन्होंने अंग्रेजी शासन के प्रतीक यूनियन जेक को नीचे उतारकर तिरंगा फहराया था....

विदर्भ से नाता गहरा --- उनका विदर्भ से गहरा नाता था ॥ दिल्ली की राजनीती में रमे रहने के बाद भी वह समय निकालकर वर्धा आते थे ... यहाँ आकर काम करवाया करते थे.... जिस दिन उनकी मौत करता समाचार लोगो ने सुना तो आखें नम हो गई.... लोग कह रहे थे अगर वो ९१ में वर्धा से नहीं हारते तो शायद नर सिंह राव की जगह प्रधानमंत्री होते.....राजीव की हत्या के बाद वह लगातार हाशिये में चले गए... ९१ की हार के बाद पार्टी ने उन्हें १९९६ में दुबारा वर्धा से टिकट दिया लेकिन वह अपनी सीट नहीं बचा पाए....इसके बाद से उन्होंने कभी इस संसदीय इलाके में कदम नहीं रखा .....

उनकी मौत के बाद भी आज विदर्भ में उनके प्रशंसको की कमी नहीं है... शायद यही कारन है आज भी लोग उनकी गिनती इस इलाके में "विकास पुरुष"के रूप में करते है.........

Sunday, September 11, 2011

घट गया डाकिये के थैले का वजन ............

फूल तुम्हे भेजा है ख़त में .... मैंने ख़त महबूब के नाम लिखा ... चिट्टी का जिक्र आते ही दिमाग में उमड़ घुमड़कर यह गाना आने लगता है.... एक जमाना था जब ये गाने हर व्यक्ति की जुबा पर होते थे लेकिन आज यह सिलसिला थम सा गया है..... आज हर कोई" मुन्नी", "शीला "और "जलेबी बाई" की बात करता है ...

जब से संचार क्रांति का बाजा बजा है तब से डाक विभाग के थैलों का वजन घट गया है....
पिछले दिनों वर्धा के डाकघर में पोस्ट कार्ड लेने पंहुचा तो वहां काम करने वाली एक महिला से मैंने पोस्ट कार्ड देने की मांग की..... इस पर वह मेरा मुह देखती रही और हसने लगी......उसने कहा आज के समय में पोस्ट कार्ड का कुछ महत्व नहीं रह गया है ..... शायद वह ये भूल गई आज़ादी से पहले और आज़ादी से बाद तक इस पोस्टकार्ड ने अपनी यात्रा पूरी की और सम्पर्क एक दूसरे से कायम रखा ....

मोबाइल और इन्टरनेट के युग में लोग आज पत्र लिखना आलस समझने लगे है.....पिछले दिनों महाराष्ट्र में एक दैनिक समाचार पत्र के संपादक ने भी मुझसे मुलाकात में यही कहा ... वह बोले आज संपादक के नाम पत्र अखबारों में कोई नहीं लिखना चाहता ...... एक दौर था जब ग्रामीण इलाको में एक दूसरे को पत्रों के माध्यम से सन्देश पहुचाये जाते थे लेकिन जैसे जैसे तकनीक का विकास होता गया वैसे ही मनुष्य के तौर तरीको में बदलाव आता गया.....

मोबाइल के उपयोग ने आज हर काम को आसान बना दिया है ....लोग सरल मोबाइल संदेशो के माध्यम से अपनी भावनाओ का जहाँ इजहार कर रहे है वही घंटो बतियाते हुए एक दूसरे का हाल चाल पूछ लेते है.....अभी अधिक समय नहीं बीता जब एक दूसरे की आशल कुशल जानने का माध्यम यही पत्र हुआ करते थे ....डाकिये के डाक लाने की सभी प्रतीक्षा किया करते थे ...अपनों के पत्र अंतर्देशी में या पोस्टकार्ड पर आते थे.....पत्र में ही सवाल होते थे उसी में जवाब भी दे दिए जाते थे.....

हँसता मुस्कुराता डाकिया जब मेरे घर पहुचता था तो माँ की ख़ुशी का ठिकाना नहीं होता था.... वह मेरी चिट्टियो को सुरक्षित रख दिया करती थी.... मैंने पहला पत्र अपनी अनीता दीदी को लिखा था ....उस समय ५ वी क्लास में पड़ता था .... उसी दौरांन दीदी की शादी भी हुई थी ....शादी के बाद वो मसूरी चली गई लेकिन पत्र के माध्यम से मै उनको अपने पास ही पाता था..... उस दौर के पत्रों की खासियत यह थी लोग उन पत्रों को लम्बे समय तक सहेजकर रखते थे .... लेकिन अब थ्री जी का जमाना है... मोबाइल में फैस बुक के बिना काम नहीं चलता ... फेसबुक तो आज कनेक्ट रहने का जरिया नहीं बल्कि दरिया बन गया है .... लोग अपने मोबाइल में रात दिन मेसेज मेसेज खेलने में लगे रहते है.....आज मोबाइल की पहुँच सर्वसुलभ होने के चलते तकनीकी विकास के दौर में चिठ्ठी कही गुम सी हो गई है ....




उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊ के लोगो में नंदा देवी पर बड़ी आस्था है ......रहस्य और रोमांच से भरी दंतकथाओ में इसका रूप देवी से बढ़कर यहाँ की बेटी बहू एक साधारण युवती के रूप में उभर कर आता है.... एक आम पहाड़ी लड़की की तरह इसकी शादी भी होती है ....वह हर बार मायके से आने के बाद अपने सौरास (ससुराल) जाती है और अपने सगे सम्बन्धियों से बिछड़ने से रूठती भी है.....

नंदा राजजात से जुड़े मानवीय पहलुओ के अनुसार अपने मायके के इलाके चांदपुर से अपने ससुराल के इलाके बधाण में पति शिव के निवास त्रिशूली पर्वत की जड़ तक पहुचने का जिम्मा मायके वालो को निभाना पड़ता है......इसी परम्परा को लेकर वर्षो से नंदा देवी पर्व राज्य में लोग मनाते आ रहे है ..... नंदा राजजात हर साल कुमाऊ और गढ़वाल में धूम धाम से मनाया जाता है .........

गढ़वाल के राजाओ के वक्त इस यात्रा का आयोजन उनके स्वयं के द्वारा होता था जिसकी जिम्मेदारी अब कुवर भाइयो के द्वारा निभाई जाती है .....हर साल यात्रा के दौरान ये लोग सौगात लेकर नंदा देवी के डोले, हेमकुंड जो त्रिशूली पर्वत के शिखर के ग्लेशियर से बना ताल है वहां पर छोड़ आते है ..... इस यात्रा का मुख्य अंग चौसिंग्या ढेबर रहता है जो दूत के रूप में यात्रा पथ में जात की अगुवाई करता है ...... यात्रा से पहले टिहरी नरेश या उनके भाई कुंवर लोग देवी से मनोती मांगते है ... इसके बाद चांदपुर के समीप एक चौसिंघा बकरा पैदा होता है .... जिसे कुंवरो के पुश्तेनी गाव कुबा में लाया जाता है ....इसे खूब सजाया जाता है और आहार देकर पूजा जाता है ......साथ ही रिंगाल के आकर्षक छपरे भी बनाये जाते है ....

इसी तरह कुमाऊ में भी नंदा देवी महोत्सव नैनीताल, अल्मोड़ा समेत कई स्थानों में धूम धाम के साथ मनाया जाता है .....लोग देवी को खूब सजा धजाकर ढोल नगाडो के साथ विदा करते है ....नन्दा का यह उत्सव कई बरसों से मनाया जा रहा है जो यह बताता है देवभूमि में कई प्राचीन परम्पराए आज भी जीवित है.......